बीमा सुरक्षा और सुनिश्चित धन वापसी - कविता - अविनाश वाचस्‍पति

निश्चित धन वापसी और बीमा सुविधा
संदेह नहीं यह पक्‍का बनाती है विश्‍वास
विश्‍वास में ही मौजूद रहती है यह आस
धन भी मिलेगा और निडर भी बनोगे
पॉलिसी आयु सीमा जीरो से 70 साल
शून्‍य का बहुत महत्‍व है, जानते हैं
शून्‍य दिया है भारत ने यह विश्‍वास
सात से सत्‍तर शून्‍य से ही बनते हैं
अंक के आगे जोड़े जाएंगे जितने शून्‍य
उतनी खुशी मिलेगी जिसे पाना हक है
हरेक पॉलिसी धारक का परिवार को
अपने नॉमिनी और स्‍वजन जन को
एक तय राशि की बीमा पॉलिसी लें
जोखिम से रहें दूर नहीं हों मजबूर
यही बतला रहा हूं मेरे प्रिय हुजूर
उपयोगी और लाभकारी जैसे खजूर
वैसे बीमा पॉलिसी लेने में जोखिम नहीं
हरेक की जरूरत के हिसाब से लीजिए
धन आनंद लीजिए और खुशी पीजिए
जितना भी जिएं खुश होकर आप जिएं
यमराज क्‍या पिएगा आप ही उसका
खून पीजिए और बल बलवान बनिए
यह बल आपको बनाएगा ताकतवर
आप अच्‍छे सच्‍चे मन से जान लीजिए
आपको अगर मेरी बात लग रही है
सच्‍ची तो मुझे कॉल कीजिए मुच्‍ची
आपसे तय करके पूर्व समय मिलूंगा
पूर्ण जानकारी सलाहकार संग दूंगा
मेरे नंबर हैं अनेक काम करें सब नेक
09560981946, 09213501292
09868166586, 01141707686
--- अविनाश वाचस्‍पति
साहित्‍यकार सदन, 195, पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश, नयी दिल्‍ली 110065 ई मेल nukkadh@gmail.com

तितली फूलों की रानी है - बाल क‍विता - अविनाश वाचस्‍पति


आई तितली
जैेसे बिजली
चारों ओर
उजाला छाया।

तितली पीली
उजाला सफेद
रंगों का देश
हुआ जगप्रवेश।

तितली रंगबिरंगी
स्‍वाद नारंगी
जादुई इसके पंख
बज उठा हो शंख।

तितली के सौ रंग
इनके अजब है ढंग
मनमोहन हमने दिखाई
देखो हर मन की जंग।

तितली देखी तो यूं लगा
पी ली हो रंगों की भंग
इसकी आई जंग की
 पी रंगों के संग।

तितली फूलों की रानी है
जीवन उसका परागकण
कण कण में मौजूद है
इनका हरेक जीवन क्षण।



डायबिटीज की मिठास के विविध रंग - इंसान लगाए इंसुलिन

##Diabities

कविता लिखी और प्रतिलिपि करने के फेर में डिलीट हो गई
लिखी कविता मधुमेह पर यानी मधु की बरसात पर
मीठे और मिठास की हो रही है चहुं ओर बरसात
इस बरसात में भीगने से बचने के लिए
लगा रहा है इंसान इंसुलिन

इंसान और इंसुलिन का क्‍या है मेल
समझ नहीं पाया कोई मेल न कोई फीमेल
पर बिना इंसुलिन के इंसान का नहीं रहता
हाजमा यानी पाच‍नक्रिया दुरूस्‍त
वैसे तो गोलियां, टेबलेट और कैप्‍सूल भी हैं
इनके विकल्‍प, पर वे नहीं बन सके आज तक कल्‍पव़ृक्ष

कल्‍प क्‍या वे तो पेड़ भी नहीं बन सके
पत्‍ते ही रहे या रहीं पत्तियां
इंसान करता रहा रोजाना खाने पीने में गलतियां
मधु की रोज बरसात होती रही और वो भीगता रहा
भीगता क्‍या रहा, शरीर उसका छीजता रहा
वह कुछ कर न सका

मेहनत करना उसे भाया नहीं
रोजाना एक सौ कदम चल वह पाया नहीं
एक बार जो आराम करने को पसर गया
तो आराम शब्‍द में राम तलाशता रहा
फिर तो न माया मिली न मिला राम
मधुमेह का शिकार हो गया
शरीर उसका बीमारी का अंगार हो गया

कह सकते हैं कि इंसान से बेकार हो गया
कार में सवार होकर इसमें और इजाफा हुआ
इंसान मधुमेह यानी मीठेपन का तराशा हुआ
हुआ हुआ करता रहा, मीठे को तरसता रहा।

- अविनाश वाचस्‍पति
मोबाइल 08750321868/09560981946

अविनाश वाचस्‍पति को हिंदी ब्‍लॉग जगत में बाधा डालने के आरोप में सजाए फांसी

सच्‍चाई है यह
जो आया है 
जाएगी वही  
अकेला आया है
अकेला चला जाएगा

अमर अमर भी न हुए
अविनाश कैसे 
हो जाएगा अमर

चाहे लिखे अविनाशी
चाहे लिखे मुन्‍नाभाई
अन्‍नाभाई, अन्‍नास्‍वामी
अकेला आया है
रुकेगा नहीं
चला जरूर जाएगा

श्‍मशान घाट है जिस 
सफर का अंतिम स्‍टे सन
वायुयान नहीं उड़ा करते हैं
न गुजरती हैं रेलें
बस भी बाहर से
निकल जाती है

अपने वाहन से आना मना है
पैदल शामिल होने की ठानी है
यह हिंदी ब्‍लॉग जगत की
कुरबानी है
बकरा कट रहा है
बकरा अविनाश वाचस्‍पति है

आप आमंत्रित हैं
पता निगम बोध घााट
7 नवम्‍बर 2014
जरूर आइयेगा
और इनाम ले जाइयेगा


फांसी सफर
7 नवम्‍बर 2014 को
निगम बोध घाट
पंत नगर से सायं
4 बजे शुरू होगी
शामिल होने की
अनुमति सिर्फ
उन्‍हीं हिंदी ब्‍लॉगरों
को मिलेगी
जिन्‍होंने अपने अपने
सबसे लोकप्रिय हिंदी ब्‍लॉग
पर इस आशय की सूचना
पक्‍के गोंद से चिपकाई होगी।

सत्‍ता मंच पर लीला प्रदर्शन : दैनिक जनवाणी 12 जून 2014 अंक में संपादकीय पेज पर 'तीखी नजर' में प्रकाशित

विकास महाराज भी पीएम जी से खौफ खाए हुए चक्‍कर काट रहे हैं। कल तक जो सत्‍तानशीनों की चरण-वंदना किया करते थे और आरती गाया करते थे, उनकी आरती में दोगुने और तिगुने का भी फासला था। पर नए नवेले पीएम जी ने एक दफा सब पर, सबके सामने एक ऐसी दफा लगा दी जिसे टीवी चैनलों, मीडिया के विविध मंचों पर तैनात मीडिया सैनिकों ने तुरंत उठाकर ज्‍यों का त्‍यों प्रसारित कर दिया। इससे अन्‍य किसी को तो नहीं, पर विकास महोदय को खूब लाभ हुआ। यूं तो विकास भी अचंभा के अंतिम अक्षर भा की ही उत्पत्ति था पर पीएम ने प्रत्‍यक्ष में जिस राजनैतिक दल के बूते पीएम की चेयर हासिल की थी, उसका प्रथमाक्षर यही पहला अक्षर था। मालूम नहीं यह या अन्‍य कोई बात अथवा और कुछ पीएम जी की दुखती रग को कुरेद रहा था और उन्‍होंने पहली दफा अपने पावन पैरों को पकड़ने का पुण्‍य लाभ लेने वालों को दफा कर दिया। भाजपा वाले पीएम का यह रौद्र रूप देख भाग गए और बाकी दौड़ने के लिए उद्यत हो उठे। दौड़क समझ नहीं पा रहे थे कि कल तक जिनके चरण-स्‍पर्श करके वह धन्‍य हो रहे थे, आज उनके मुख से धन्‍यवाद भी नहीं निकल रहा था, पर यह लीला समझना उनके लिए पॉसीबल न था।
सत्‍ता-मंच पर लीला प्रदर्शन से ही वह परेशान हो जाया करते थे, जबकि आज वह मन से दुखी थे। उनके मन के सुख की वैतरणी इनके पैरों में निवासित थी। विकास कब विलास हो गया, इसका उन्‍हें अहसास तलक नहीं हुआ। वह सब विकास को तलाश रहे थे, इसी का पर्याय उन्‍हें पीएम की कुर्सी तक जाकर कब विलास तक पहुंचाया आया , मालूम न चला। जब विकास रास्‍ता भूल जाता है तब अच्‍छे दिन नहीं आते हैं  और बुरी रातें अंधेरा होने के कारण आने से डर जाती हैं। रातों का आना तो दिखाई नहीं देता है और अच्‍छे दिन आते नहीं हैं। जिससे सफलता का फलसफा, गर्मियों का काला-काला फालसा मत समझ लीजिएगा, विफल हो जाता है। सब एक ही चिंता में निमग्‍न हो जाते हैं कि अब अच्‍छे दिन कैसे आयेंगे। पीएम ने तो विकास चचा से पैर छुआने से मना करके कैसी मुसीबत ले ली है, यह तो वह नहीं जानते। पर विकास की नाराजगी अवश्‍य दिक्‍कत की फसल उपजाएगी, इस संकट से निबटने में काफी ऊर्जा लग लाएगी। विकास चचा की नाराजगी के कारण जेबों में अकाल जैसी दुखदायी स्थितियां खरपतवार की उग जाएंगी और खर की खेती किसान और पब्लिक पर कहर अवश्‍य ढाएगी, अब वह सकारात्‍मक लहर किस तरह से लाई जाएगी जो जड़ों को मट्ठा नहीं, मजबूती बख्‍शेगी।
विकास की क्रांति की गति अवरुद्ध कर दी गयी है। जिन्‍होंने की  है,  उन्‍होंने ही इनके जरिए शिखर पर पहुंचना था। अब उनके कारनामे जिस डाल पर डेरा डाले बैठे हैं, उसी को काटने का लुत्‍फ लेना चाह रहे हैं। यह वही डाले हैं जिन पर चिडि़यां बसेरा करती हैं पर उन पर चिड़ों की जगह कौओं,गिद्धों और चीलों ने ठिकाने बना लिए हैं।  वहां पर उल्‍लू उल्‍टे होकर टंगते तब भी मंगल गीत गा लिए जाते।  मेरा आशय यह बिल्‍कुल नहीं है कि इन गीतों को उल्‍लुओं की पत्नियों ने गाया होगा जबकि मंगलगीत राक्षसों के यहां पर गाए जाने के उल्‍लेख भी मिलते हैं। यह भी विकास का उजला पक्ष है जो शाम के धुंधलके में बजाया गाया जाता है। इसमें शामिल सब नहीं होते सिर्फ जो स‍ब्र रखते हैं, वही होते हैं। विकास तक पहुंचने के लिए सब्र और सबक दोनों आवश्‍यक हैं और इन सबसे जरूरी है इन सबके लिए एक उचित योजना बनाना।
इसमें‍ विचारणीय यह है कि योजना बनाए बिना कितने ही योजन चलते चले जाओ। पर फिर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाओगे। योजनाएं फुस्‍स हो जाती हैं। अधर का अर्थ ओंठ मत समझना, तक भी नहीं पहुंच पाती हैं। उन्‍हें योजना कहते हुए भी शर्म  आती  है।  विकास की तो छोडि़ए, धरा से अधर तक का सफर आरंभ ही नहीं होता। सब किया-धरा अधर पर डोलायतान नजर आता, इसलिए इसे विकास नहीं कहा जाता है क्‍योंकि यह दिखावटी होता है और टिकाऊ इसका जर्रा भी नहीं, जबकि जब तक विकास का जर्रा-जर्रा मजबूती से नहीं जमा होगा, तब तक इसमें कड़कपन नहीं मिलेगा और न ही इसे सही अर्थो में विकास ही कहा जाएगा।

कटी पतंग लूटने का जश्‍न : डीएलए 2 जून 2014 में प्रकाशित



मजदूरनियों की दुर्दशा पर कोई गौर नहीं :डीएलए में 20 मई 2014 को प्रकाशित


आलू निचोड़ कर बिजली बनाई : दैनिक हिंदी मिलाप 17 जनवरी 2014 में संपादकीय पेज पर प्रकाशित


नए साल का आनंद : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ 'उलटबांसी' में 1 जनवरी 2014 को प्रकाशित


मुन्‍नाभाई के जन्‍मदिन पर 'कुर्सी की किस्‍मत का खिलना' : दैनिक मिलाप 14 दिसम्‍बर 2013 को प्रकाशित



तहलका का हलका होना : दैनिक हरिभूमि 4 दिसम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


'रामलीला' की आधुनिक लीलाएं : दैनिक हिंदी मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 30 नवम्‍बर 2013 में प्रकाशित



भारत रत्‍न बनाम महाभारत रत्‍न : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ उलटबांसी 20 नवम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


यह तोता है खुदगर्जी का : दैनिक नेशनल दुनिया स्‍तंभ 'चिकोटी' 8 नवम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


जांच कर लो जी, सत्‍ता की फिज़ा में गुंजायमान होती यह आवाजें पीएम की हैं। बात यह है कि निडर होना, चाहे पीएम की फितरत नहीं है पर जब जांच पालतू तोते ने ही करनी है तो वह क्‍यूं डरें। तोते का रंग हरा है इसलिए उनके गुनाहों को हरी झंडी दिखा दी जाएगी। तोते को सिखाया गया है कि जब जांच हो तो जो रटा रटाया है, वही बोलो टिम्‍बकटू।
हम मियां हैं, महोदय नहीं इसलिए मिट्ठू-मिट्ठू करते हैं। तोता खुदगर्जी की मिसाइल है। यह मिसाइल अपने मालिक को चोटिल नहीं करती पर सामने वाले को नहीं बख्‍शती। तोताचश्‍म हमारा मिट्ठू  है।  मिट्ठू  बोल  नहीं सकता कड़वा, मीठा ही बोलेगा, मिठास ही घोलेगा। इंसान के भाव के मसले पर तोता नियत शर्तों का उल्‍लंघन नहीं करता। फिर तोता हो या सीबीआई मीठा ही मीठा गाता है, मीठापन ही सत्‍ताधारियों को लुभाता है।
 
तोता चाहे जंगली हो, पर नेताखोर नहीं होता और न होता है आदमखोर, पक्षीखोर भी नहीं होता है। घर में रहे तो पिंजरे में रह कर राम राम रटता है,  पेड़ की खोह में रहे तब भी राम राम, आप भले ही उससे आसा पाल लें पर वह नहीं पालता। तोता है मीठेपन का सोता। पीएम जानते हैं इसकी खूबियों को पहचानते हैं। तोता पक्षी है, घोड़ा नहीं है। झांसी की रानी के घोड़े चेतक की वफादारी इतनी जल्‍दी भूल गए क्‍या। पालने वालों ने तो हाथी भी पाले हैं, उनके बुत बना पार्कों में सजाए हैं।

हमने उसे झाडू है थमाई कि चौबीसों घंटे करता रहे अपने घर को हमारा समझ उसकी साफ सफाई। हम उसकी अपाइंटमेंट अथॉरिटी हैं, इसलिए वह हमारे आभारी हैं। उनकी पसंदीदा लाल मिर्च के मालिक हम हैं, वह कैसे हमारे उलट बोलेंगे, नहीं भी देंगे तब भी किसी तीसरे को जख्‍मी करने के लिए अपनी चोंच खोलेंगे। तोते वफादारी की मिसाल हैं। तोते करते हैं गर परिहास तब भी मालिक की  ऊंगली का नहीं करते सत्‍यानाश। मालिक की ऊंगली अपनी चोंच में बहुत एहतियात के साथ दबोचते हैं।

तोते मोतीचूर, बेसन के लड्डू नहीं खाते, हलवा भी नहीं । इससे यह मत समझ लीजिएगा कि वह खोते होते हैं, उन्‍हें मीठे की तमीज नहीं होती है।  आप सोच रहे हैं कि तोते के लाल व हरी मिर्च खाने के मूल में शुगर होना हो सकता है। पर यह तोता है खुदगर्जी का। यह करता तो मिट्ठू मिट्ठू है पर खाता मिर्ची है। पोलेपन को छिपाने में माहिर तोते की तुक सोते से मिलती है । सोते समय भी वह खुर्दबीन सरीखी अपनी उल्‍लूमयी गोल-गोल आंखों को नचा-मटका कर, उलट पलट करके गच्‍चा देता है, इसका दिया गया गच्‍चा इसलिए मजबूत होता है क्‍योकि वह स्‍वार्थसिद्धि का हुनरमंद खिलाड़ी माना गया है।

सोना सोना सोना : हरिभूमि 25 अक्‍टूबर 2013 अंक में प्रकाशित


रोजगार ही रोजगार : कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस 19 अक्‍टूबर 2013 में प्रकाशित


मीठी सदा बोलती वाणी (कविता)



सबकी हूं मैं गुडि़या रानी
मीठी सदा बोलती वाणी
मंद मंद मुस्‍काती हूं
सबके मन को भाती हूं।
- दादाभाई के सत्‍यवचन।

तेलंगाना - तेल में तैराकी या गाना



हसीना क्‍या चाहेअगर हसीनाओं की चाहत पर चाहें और उनकी चाहत पूरी करने लगें तो सारा जहां ही कम पड़ जाए। पर यहां पर बात करेंगे तेलंगाना की। हसीनाओं और तेल का किस्‍सा बहुत पुराना है क्‍योंकि हसीनाओं को हसीन फिगर बनाए रखने के लिए नृत्‍य के रियाज़ में जुटे रहना होता है। पर हसीनाओं की कुछ शर्तें भी होती हैं। इनमें से कुछ को नाचने के लिए नौ मन तेल की जरूरत होती है। एक बेहद प्रचलित लो‍कोक्ति है कि ‘न नौ मन तेल होगान राधा नाचेगी।‘ कुछ हसीनाएं जो नाचना जानती नहीं हैं पर अपने को कमतर  भी साबित नहीं होने देना चाहतीवे आंगन को टेढ़ा बतला कर अपना काम निकाल लेती हैं। तेल और आंगन की रिश्‍तेदारी के नए आयाम कुछ इस तरह से कायम हो रहे हैं कि नौ मन तेल को आंगन में लुढ़काया जाए और तेल में से और तेल के निकलने के रास्‍ते बंद कर दिए जाएं तो जो स्थिति बनती है वह नृत्‍य की कमतैरने की अधिक होती है। फिर तेल में नाचने की कोशिश की तो मुंह जरूर टूटेगा इसलिए उसमें तैरना ही मुफीद रहेगा। अब तेल रिफाइंड रहेगा या सरसों का,इस बारे में पाठक और पाठिकाओं की सलाह को वरीयता दी जाएगी क्‍योंकि नाच उन्‍होंने ही देखना है।
वैसे ही जैसे तेलंगाना को राज्‍य का दर्जा दे कर गाना शुरू किया जाए। अब उस राज्‍य की प्राथमिकताएं तय करना तो नागरिकों का हक होना चाहिए जबकि इस हक पर डकैती नेता डाल लेते हैं। वे राज्‍यों के टुकड़े भी इसलिए ही कर सकते हैं कि उन टुकड़ों पर कुत्‍ता झपटी कर अपना घर भर सकेंचाहे जनता का पेट भरे अथवा नहींइसकी चिंता किसी को नहीं रहती है।   
अब तेल में तैरते हुए गाने में माहिर तो नेता ही हो सकते हैंयह विशेष कार्य न तो नृत्‍यांगनाओं के बूते का है और न नागरिकों के बस का। तेल में तैरनातेल में गानान नौ मन तेल होनानाच न जाने आंगन टेढ़ा,तेल और तेल की धार देखनाइसमें से कितने ही गुण नृत्‍यांगनाओं के नहीं नेताओं के चिकनाई आइटम कहे जा सकते हैं। जबकि  दोनों शब्‍दों का आरंभ न से ही होता है। फिर न  न करते प्‍यार तेल से कर बैठे,जबकि प्‍यार राज्‍य के बंटवारे पर लुटाया जा रहा हैइस प्रकार का  गीत लिखने के लिए प्रसून जोशी तो प्रयास करने से रहेगुलजार भाई कोशिश कर भी लें अन्‍यथा मुझे ही लिखना पड़ेगा। पर मेरी राय में यह कार्य बयानवीरों के लिए मुश्किल नहीं हैचर्चा भी खूब होगी। कुछ गलत कह भी दिया तो उससे पलट भी सकते हैं।
और हम सब फिर से एक बार तेलंगाना तेलंगाना खेल सकते हैं। भविष्‍य में हर नगर का राज्‍यराज्‍य में प्रत्‍येक घर एक राज्‍य,पर टकराव तो तब भी खत्‍म होने का नहीं हैजब सब अपनी अपनी पगार के खुद मुख्‍तार होंगे और यही मुखियागिरी सभी दुखों की दुखियारी मां के रूप में सम्‍मान पाती रहेगी।

-    अविनाश वाचस्‍पति

चुनौतियां लेखन की : डीएलए दिनांक 27 सितम्‍बर 2013 में प्रकाशित


गरीबी पर योजना आयोग बार बार मुद्दे को गर्म कर देता है मानो ठंडे खाने को गर्म कर रहा हो और हर बार अपनी ही हदों से बाहर उबल-उबल कर गिरने लगता है।  ऐसे में लेखक के लिए जरूरी है कि वह गरीबी जैसे सनातन पर पुराने घिसे-पिटे विषय पर नए सिरे से ऐसा लिखे कि दोहराव न हो और पुराना छपा दोबारा छपवाने से सदा परहेज करे। जबकि दोनों तरह के लेखक पाए जाते। यह मत समझिए कि लेखक दो तरह के ही होते हैं। कुछ लेखक मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में खूब अच्‍छी तरह से लिख लेते हैं, कुछ ऐसा लिखते हैं कि दोनों का बराबर संतुलन बना रहे। इनमें से कुछ को शर्तिया नेता होना चाहिए था, पर वे न जाने किन मजबूरियों के चलते लेखक बन गए।

जो छप जाए अच्‍छा, कई बार अलग-अलग दोनों तरह का ही छप जाता है। यह वे लेखक होते हें जो लिखने से अधिक किसी भी तरह छपने को वरीयता देते हैं। इंटरनेट के दौर में जो लेखक अपनी रचनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों के अखबारों में छपवाते हैं, यह विचारों को अधिक व्‍यापक तौर से अधिक पाठकों तक पहुंचाने का उनका ऐसा तरीका है जो एकदम सही है। इसका कारण पूछने पर उनका कहना है कि कुछेक अखबारों के संपादक आजकल की सूचना क्रांति के इस महज सस्‍ते दौर में रचना मिलने पर उसके छपने या न छपने की सूचना देने में अपनी हेठी समझते हैं। जबकि इसके विपरीत कुछ स्‍वीकृति की सूचना के साथ प्रकाशन के दिन की भी जानकारी देते हैं। उधर विषय पुराना होने पर उनका लेखन आउटडेटेड हो जाता है। इसलिए वे लिखने के बाद न छपने का रिस्‍क नहीं लेते हैं और जो संपादक बतला देते हैं, उन्‍हें भेजे/छपे लेख मजाल कि कहीं पर दोबारा छप जाएं।

वह बात दीगर है कि दूरदराज के अखबार उनकी रचनाओं को हूबहू अपने अखबार में छाप लेते हैं और उसकी सूचना भी नहीं देते हैं। कई बार वे तो वे रचनाकार का नाम प्रकाशित करना भी जरूरी नहीं समझते हैं। ब्‍लॉग से अच्‍छी रचनाओं का चयन करके भी अखबारों में प्रकशित किया जाना एक स्‍वस्‍थ परंपरा है। जबकि इस पर ब्‍लॉग लेखक इसलिए कुपित पाए जाते हैं कि उनकी रचना तो छाप दी गई लेकिन न तो उसके प्रकाशन की सूचना ही उन्‍हें मिली और न ही प्रकाशित रचना की स्‍कैन प्रति अथवा लिंक ही, ऐसे में पारिश्रमिक या मानदेय की उम्‍मीद करना तो बिल्‍कुल बेमानी है।

मेरा मानना है कि बेहतर विचारों का प्रकाशन अवश्‍य होना चाहिए और उन्‍हें अधिक से अधिक पाठकों तक किसी भी जरिए से पहुंचना चाहिए। पर अधिक उत्‍साही लेखक इससे यह न समझ लें कि वे अपनी रचनाओं के इश्‍तहार छपवाकर अखबारों में डलवा या नुक्‍कड़, चौराहों और मोहल्‍ले में बंटवा सकते हैं। वे कर सकते हैं पर उन्‍हें इसलिए नहीं करना चाहिए क्‍योंकि यह एक तो सस्‍ती लोकप्रियता वाला हथकंडा है, दूसरा वे कोई दवाईयों, स्‍कूल, नृत्यशालाओं, जिम, साइबर कैफे का विज्ञापन तो कर नहीं रहे हैं।
इससे निष्‍कर्ष यह निकलता है कि बेहतर लिखो, अपना पाठकवर्ग तैयार करो, वह सकारात्‍मक लिखने और पाठकों तक पहुंचने से ही तैयार होगा।

झूठ का लालकिला : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 10 सितम्‍बर 2013 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित


 
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