वह आता दो टूक फेसबुक के करता, फेकबुक बनाता अपनी थुलथुल काया लेकर वापिस चला जाता

वह आता दो टूक फेसबुक के करता
लाइक करता, टिप्‍पणी धरता
पोस्‍ट कभी न लगाता
जहां फंसाता, वहीं खुद फंस जाता
कहीं चेहरा सजाता सलमान का
कहीं चेहरा छिपाता अपने मेहमान का


वह आता दो टूक फेसबुक के करता
लुक अपना लड़के से लड़की में बदलता
खूब पसंद पाता
वाह वाह से मन भर जाता
टिप्‍पणी अपने घर भी ले जाता
अपनी पत्‍नी से छिपाता
बच्‍चों को भी नहीं बताता
भरमाता, दो बच्‍चों का पिता
खुद को सबसे सुंदर समझता
ताकत से अपनी खुद को खुदा समझता

लड़कियों को लुभाता
प्रशंसा में फेक गीत गाता
तब भी किसी को न भाता
चुराकर किसी की कविता
कर अनुवाद अपनी बताता
विचार चुराकर लाता
कभी किसी के, कभी किसी के
अपनी दीवार पर
अपनी टाइम लाईन पर
अपने ब्‍लॉग पर कतार में
अधेड़ महिलाओं  की लाईन लगाना

जहां कन्‍या स्‍वरूपा बनता
लाईन पुरुषों की
अधेड़ों की लगी पाता
झुंझलाता, दांत पीसता
गर्व उसका यूं ही पीस जाता।

वह आता दो टूक फेसबुक के करता
कदम अपने ब्‍लॉग पर लाके धरता
धरती पर कभी न टिकता
जिम में जाकर दम उसका मचलता
सामने आने पर सारा यूं ही निकलता।

वह आता फेसबुक को
फेकबुक बनाता
बनाता या खुद बन जाता
वह जाता
वह जाती
दूर से काया इकहरी
एक ककड़ी, एक खीरा नजर आती
वह चिल्‍लाती उसे अपना खसम बनाती
फेसबुक पर खाता अपना खोल न पाती
सारी उम्र यूं ही जुल्‍म उठाती
फेसबुक पर टिप्‍पणी पाने को तरस जाती।

सुनिए दिल्ली गान (Listen Delhi Anthem)


कविता: बनो आधुनिक पर मत भूलो सनातन इतिहास


ओ राम मेरे कैसा 
गजब ये हो गया,
आजकल का रंग-ढंग 
कैसा अजब हो गया

जो वस्त्र होता था नीचा वो ऊँचा ,
और जो होना था ऊँचा वो नीचा हो गया,
जब तक ''जोकी'' लिखा न दिखे,
इनको आता चैन नहीं ,
अगर करे कोई टोका-टोकी 

ये हो जाते बेचैन

पूरी कविता को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

हम स्कूल में इंसान बना रहे हैं या फिर जानवर?


    मारे समाज में अपराधों की फेहरिस्त लगातार लंबी हो रही है.अगर हम इस का कारण जानने की कोशिश  करेंगे तो आम तौर पर  बेरोजगारी,अशिक्षा गरीबी,पिछड़ापन इस के मुख्य कारण नज़र आते हैं.परन्तु आज के समय में इन कारणों से हटकर भी कुछ अन्य कारण है जिसने हमारे समाज कि नीव को हिला दिया है और हमारे लिए एक समस्या का रूप ले चुके है.देश में किसी भी अपराध की  अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद और फांसी निर्धारित है पर मैं जिन अपराधों के बारे में बात कर रही हूँ वो बच्चों से जुडे है और इन अपराधों की जगह स्कूल बन गए हैं....आज हम  स्कूल के छात्रों द्वारा अपने ही सहपाठी का क़त्ल करना,अपने शिक्षकों के साथ अभद्रता,अपने शिक्षक का क़त्ल,छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से दुश्मनों जैसा बर्ताव करना आदि स्थितियां देख रहे है.आज सबसे ज्यादा स्कूलों में अपराध का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ रहा है.जिस स्थान को हम विद्या का मंदिर कहते है.वहाँ पर ज्ञान प्राप्ति के साथ आज हमारी नयी पीढ़ी आपराधिक गुण भी सीख रही है. क्या यह सही है?

मौन (लघु कथा)


 वन कुमार जी ऑडिटोरियम के मुख्य दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि दरवाजा बंद कर दिया गया. काफी देर दरवाजा खटखटाया तो चौकीदार बाहर निकला व बोला, "साब ऑडिटोरियम में घुसने का समय समाप्त हो गया है और वैसे भी अंदर बहुत भीड़ है. आप वापस ही लौट जायें." पवन कुमार जी चौकीदार को सुनते हुए मन ही मन विचार कर रहे थे, कि आज के दिन के लिए कितने दिनों से लगा हुआ था. "भ्रष्टाचार के विरुद्ध मौन" इस सन्देश को ई-मेलपत्रों व एस.एम्.एस. द्वारा करीब एक महीने से सभी मित्रों को निरंतर भेजा और आज जब वह दिन आया तो

एक पत्र गूगल बाबा के नाम




प्यारे गूगल बाबा 
           सादर खोजस्ते!
आपके खोजूपन को नमन करते हुए पत्र प्रारंभ करता हूँ. वैसे आपके मन में यह उधेड़बुन चल रही होगी कि मैं तो आपसे रोज ही तो मिलता हूँ फिर भला यह पत्र लिखने की जरूरत कैसे पड़ गई. तो आपको साफ-साफ बताना चाहता हूँ, कि जब भी आपसे मुलाकात होती है तो बस अपने ही मतलब की बात होती है. अपना काम निपटा कर आपसे विदा ले लेता हूँ और आप मन मसोस कर रह जाते हैं. आज इसकी भरपाई करने के लिए पत्र रूप में आपके सामने हाजिर हूँ. गूगल बाबा जब से आपकी कृपा मुझ गरीब पर हुई है, तबसे जीवन सुखमय बीत रहा है.

एक पत्र होली के नाम



प्यारी होली 

सादर रंगस्ते!

     स दिन ड्यूटी समाप्त कर घर वापस लौट रहा था कि अचानक पीठ पर पानी का गुब्बारा किसी ने दे मारा. पीछे मुड़कर देखा तो एक छोटा बच्चा मनमोहक मुस्कान के साथ तोतली आवाज में बोला, “ओली है”. तब जाना कि आपका आगमन होने वाला है. नौकरी की व्यस्तता इतनी अधिक हो जाती है कि कोई त्यौहार अथवा कोई विशेष दिन याद ही नहीं रह पाता. त्यौहार के दिन ही सुबह-सवेरे आने वाले एस.एम्.एस. द्वारा पता चलता है की आज ये त्यौहार है तथा त्यौहार का आधा दिन तो एस.एम्.एस. पढने व उनके जवाब देने में ही चला जाता है बाकि जो समय बचता है तो एक प्रकार की रस्म अदायगी ही हो पाती है.
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काव्य गोष्ठी रही सफल




     शोभना वेलफेयर सोसाइटी रजि. ने मार्च 2012 शोभना वेलफेयर सोसाइटी रजि. ने मार्च 2012 को होली के आगमन के उपलक्ष में ईस्ट ऑफ कैलाश (निकट इस्कॉन मंदिर) में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया.

श्री नंद कुमार सब्बरबाल, श्री विनोद पाराशर, श्री राजेन्द्र कलकल, श्री बी.के.सिंह व श्री सुमित प्रताप सिंह इस गोष्ठी में उपस्थित कवि थे.


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इश्श्माइल करते अजय कुमार झा




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!


     साथियों अपना जीवन छोटा सा है तो इस छोटे से जीवन को हँसते-मुस्कुराते गुजारा जाए तो कितना अच्छा रहे अपनी पंक्तियों द्वारा कहूँ तो-

जीवन में दुःख है बहुत
क्यों न ऐसा करें
हँस-हँस जिएँ
मुस्कुरा के मरें...

सुख-दुःख तो जीवन में आते और जाते रहते हैं..वैसे भी जब तक हम दुःख नहीं झेलेंगे तब सुख का आनंद हमें कैसे पता चलेगा। जब भी निराशा आपको हताश व निराश करने आए तो उसकी कमर में हँसी का ऐसा जबर्दस्त लट्ठ मारिए कि फिर कभी आपके सामने आने का वह साहस ही न कर सके। तो इसी बात पर मेरे साथ मुस्कुराइए और एक जोरदार ठहाका लगाइए। अरे वाह खिलखिलाते हुए आपका चेहरा (थोबड़ा बोलूं तो चलेगा) कितना सुंदर लगता है।  कुछ-कुछ रश्मि प्रभा जीरविन्द्र प्रभात जीसुरेश यादव जीपवन कुमार भैया व संजीव शर्मा जी जैसा और ठहाका लगाते हुए तो आप इन्दुपुरी जीपवन चन्दन जीअविनाश वाचस्पति जी व राजीव तनेजा जैसे लगने लगे वैसे भी हँसने व मुस्काने से शरीर को कोई हानि तो पहुँचने से रही कुछ न कुछ तो लाभ मिलेगा ही तो अब उतार फैंकिए अपने चेहरे की मुर्दानगी और जी भरकर हँसिए (शिवम मिश्रा भैया जैसे) और खिलखिलाइये (अपन की बहना कलम घिस्सी की तरह)आइए आज इस कड़ी में मिलते हैं जीवन को हँसते और मुस्कुराते हुए बिताने में यकीन रखने वाले हिन्दी ब्लॉगर बंधु श्री अजय कुमार झा से...

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कैलाश शर्मा का बाल संसार



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     ब कभी एकांत में फुरसत में बैठता हूँ तो बचपन के सुहाने पल याद आ जाते है. वो मस्ती वो अपने नन्हे-मुन्हें दोस्तो के साथ की गई धमा-चौकड़ी भूले नहीं भूलती. आज के स्वार्थी संसार को देखकर मन करता है कि काश फिर से उसी बाल संसार में वापस गुलाटी मारकर पहुँच जाऊं और कुछ पल जी लूँ उस अनमोल जीवन को. यदि किसी ने बच्चों को भगवान का रूप” कहा है तो ठीक ही कहा है. वास्तव में बच्चों में भगवान की भांति ही सबके लिए प्रेमभोलापन और अपनापन होता है. चलिए आज मिलते हैं एक ऐसे हिन्दी ब्लॉगर से जिनका संसार बच्चों का संसार है. वह बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं और अपने इसी बाल प्रेम के कारण उन्होंने बाल साहित्य को समर्पित एक ब्लॉग भी बना रखा है.जी हाँ इनका नाम है श्री कैलाश शर्मा.

व्यंग्य सम्राट नहीं व्यंग्य शिष्य


     
     मित्रो आपके सुमित प्रताप सिंह को लाल कला, सांस्कृतिक चेतना मंच (रजिस्टर्ड), दिल्ली  ने 26 फरवरी, 2012 को आयोजित रंग अबीर उत्सव-2012 में “व्यंग्य सम्राट” नामक सम्मान से सम्मानित किया गया. इस कार्यक्रम का आयोजन अल्फा शैक्षणिक संस्थान के प्रांगण में वरिष्ठ समाजसेवी श्री कृष्णा नन्द की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
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हिंदी पूत लोकेन्द्र सिंह राजपूत


     
प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     कल रात भारतेन्दु हरिशचंद जी सपने में आये. बहुत खुश लग रहे थे. मैंने उनसे उनकी खुशी का कारण पूछा  तो उन्होंने बताया कि हिन्दी माँ के बढते गौरव व प्रचार-प्रसार को देखकर उनका मन मयूर बनकर झूम रहा है. उन्होंने हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को कोटिकोटि आशीष व धन्यवाद दिया तथा कामना कीकि यूँ ही हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों के निरंतर प्रयास से हिन्दी एक दिन विश्व के माथे की बिंदी बने. चाहे कपूत कितना भी प्रयत्न करें किन्तु हिंदी की गरिमा बढ़ती ही रहे. मैंने उन्हें हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों की ओर से वचन दियाकि हिन्दी को विश्व के माथे की बिंदी बनने से कोई नहीं रोक पाएगा. अरे हाँ कपूत शब्द से याद आया आप सबने माँ अंबे जी की आरती की निम्न पंक्तियाँ सुन ही रखी होंगी:-

माँ बेटे का इस जग मे हैबडा ही निर्मल नाता
पूत कपूत सुने हैंपर न माता सुनी कुमाता.
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भूख (लघु कथा)



     लंच की घंटी बजी,   रमा ने सुरभि  से पूछा आज टिफिन में क्या लाई है? 
सुरभि ने मुँह बनाकर कहा,"क्या होगा टिफिन में,वही रोज की तरह मम्मी ने घास-फूस रखा होगा. यार ऐसा खाना खाते-खाते मेरी तो भूख ही मर गई है, पता नहीं लोग इसे खा कैसे लेते हैं? चल हम दोनों कैंटीन में जाकर कुछ खाते है."
 रमा   ने कहा," सुरभि  फिर इस खाने का क्या करेगी?"
सुरभि बोली,"अरे वही जो रोज करती हूँ, स्कूल के पीछे वाले गेट से बाहर फेंक दूंगी."
 रमा  बोली,"ठीक है तू तब तक इसे फेंककर आ, मैं तुझे कैंटीन में ही मिलती हूँ."

शिखा वार्ष्णेय का जीवन है स्पंदन



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!


     दोस्तो लंदन शहर कितना खूबसूरत  है. यहाँ की हर इमारत,हर गली,हर दुकान अद्भुत छटा लिए हुए है. टावर ब्रिज, वेस्टमिंस्टर महल, ब्रिटिश संग्रहालय व रोयल अलबर्ट हॉल इत्यादि देखने में कितने अद्भुत लगते हैं. हो भी क्यों न अंग्रेजी साम्राज्य ने पूरे विश्व को खूब लूटा भी तो है.अपने भारत को ही ले लीजिए पूरे 190 साल तक लूटपाट कर अंग्रेजी खजाने को भरा गया. यकीन नहीं हो रहा है तो कभी फुर्सत मिले तो लाल किले के दीवाने खास व उसके जैसी अनेक खास इमारतों को जाकर ध्यान से देखना कि किस प्रकार उनमें जड़े कीमती पत्थर तक खुरच-खुरच कर निकालकर ले गये सफेद शैतान. अब अपने आपको सभ्य कहते हैं. भिखारी बन भारत आए और भारत को भिखारी बनाकर चले गए. जाते-जाते भी हम पर सत्ता करने हेतु अपनी कार्बन कापियाँ अर्थात काले अंग्रेज छोड़ गये. जो अब तक हम भारतीयों का खून चूस रहें है. यह सब देखकर आप सबके मन-मस्तिष्क में कभी स्पंदन नहीं होता. खैर आज हम मिलने जा रहे हैं इसी खूबसूरत शहर में इन सफ़ेद भूतों के बीच रहकर अपने लेखन से स्पंदन मचाने वाली हिंदी ब्लॉगर शिखा  वार्ष्णेय  से.
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ब्लॉग को मीत बनातीं सुमन कपूर 'मीत'




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो आज आपको ले चलता हूँ हिमाचल प्रदेश के मनमोहक स्थान मंडी शहर में| मंडी को प्राचीन काल में मांडव नगर तथा सहोर के नाम से जाना जाता था| मंडी हिमाचल प्रदेश का एक मुख्य शहर है| यह  हिमाचल  प्रदेश की राजधानी शिमला से 143 किलोमीटर उत्तर की ओर बसा हुआ है| मंडी शहर की सुखदायक गर्मियाँ (दिल्ली की तरह दुखदायक नहीं) और ठंडी सर्दियाँ (हमारी दिल्ली जैसी ठंडी हैं क्या?) प्रसिद्द हैं |  यह हिमाचल प्रदेश के बड़े शहरों में से एक है | इस शहर में नारी जाति के लिए इतना स्नेह और सम्मान है कि यहाँ लिंगानुपात अधिकतम (1013 महिलाएं प्रति हज़ार पुरुषों पर) है|
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चिट्ठी लिखतीं सुष्मिता सिंह






प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो कभी आपने सोचा है कि पहले चिट्टी किसने लिखी होगी? अगर पता चल जाए तो मुझे भी बताना |  अभी हाल के कुछ सालों तक चिट्ठी एक-दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख स्रोत थी प्रेमी-प्रेमिकाओं के जीवन का तो यह एक अभिन्न भाग थी और उन्होंने डाकिया चचा को देवदूत का पद प्रदान कर रखा था | किन्तु समय ने करवट बदली और चिट्टियों का युग भी बदला और बदल गई डाकिया चचा की किस्मत थी  | अब लोगों ने डाकिया चचा को मक्खी मारने का काम सौंपकर इंटरनैट पर चिट्ठियां लिखनी आरंभ कर दी हैं तथा इन चिट्टियों को संबंधित व्यक्ति तक पहुँचाने का जिम्मा भी स्वयं ही संभाल लिया है | मतलब कि खुद ही अंतरजातीय डाकिया बन गये हैं  |

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ज्योतिष जाल बुनतीं संगीता पुरी



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!


     दोस्तो सिकंदर के आक्रमण के बाद भारत का यूनान से संपर्क बढ़ा. भारतीयों ने यूनानियों को बहुत कुछ सिखाया, तो उनसे भी बहुत कुछ सीखा. ज्योतिष विद्या यूनानियों ने ही भारतीय को सिखाई. मजे की बात है कि यूनानी ज्योतिषी बिना नहाये ही सबका भाग्य बताते थे इसलिए भारतीय उन्हें म्लेच्छ कहते थे (जाने कैसे यूनानी इतने दिन बिना नहाए रह लेते होंगे, हमारी कलम घिस्सी बहना को तो एक हफ्ते में ही शरीर में खुजली होने लगती है). जबकि हम भारतीय प्राचीन काल से ही बड़े साफ़-सुथरे रहे हैं और भारतीय ज्योतिषी नहा-धोकर पूर्ण-रूप से शुद्ध होकर सबका भविष्य बताते थे और बताते हैं. हालाँकि ज्योतिष विद्या पूर्णरूप से एक वैज्ञानिक विद्या है किन्तु कुछ अधूरे अज्ञानियों ने इसे बदनाम कर रखा है. हालाँकि कुछ लोग इस विद्या के असल रूप को लोगों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं.
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इंटरनेट पर गप्प मारते शिवम मिश्रा




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तों आप भी कभी न कभी गप्प तो मारते ही होंगे. गप्प मारने का भी एक अलग ही आनंद है. हालाँकि पुरुष जगत इस मामले में महिला जगत से पीछे है, किन्तु इस विधा में कुछ ज्ञानी पुरुषों के प्रवेश से हम शीघ्र ही महिला जगत को पछाड़ देंगे. आइए आज आपसे मिलवाते है ऐसे ही ज्ञानी पुरुष से जिनका नाम है श्री शिवम् मिश्रा. शिवम् मिश्रा जी कलकत्ता में जन्मे और पले-बड़े (अब कितने बड़े यह तो आप स्वयं ही देख कर बताइएगा) और अब 1997 से मैनपुरी में अपनी गप्प नामक योग क्रिया में मस्त हैं. भई साफ़-साफ़ कहें तो मैनपुरी सुखचैनपुरी में आराम से ज़िन्दगी की रेल चला रहे है ... जो धीरे धीरे अपने सफ़र में चली जा रही है. एक जीवन बीमा एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं तो काफी नए-नए लोगों से मिलना-जुलना भी लगा रहता है और इनकी गप्प योग क्रिया में जुड़ने हेतु कुछ नए साथी मिल जाते हैं. साथ ब्लॉगिंग के कारण भी गप्प मारने के लिए काफी नए दोस्त बने है (मतलब कि अब इन्टरनेट पर भी गप्प मारी जाएगी) ... जैसे कि हम...


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वोट बेचने का बासंती मौसम आया रे ...

चुनाव का मौसम इस बार बासंती है। बसंत के पीले फूलों की छटा में करेंसी नोटों की नीली, लाल आभा अपने संपूर्ण यौवन पर है।  वोटर दिखाई दे जाए, नहीं भी दिखलाई दे, तब भी वोटोच्‍छुक वोटर को अंधेरे में भी तलाश लेते हैं। वोटर भी हरे, लाल, नीले करेंसी नोटों की कालिमा से खिंचे चले आते हैं। ऐसे ऐसे प्रत्‍याशी देखे गए हैं जिन्‍हें यूं तो कुछ दिखलाई नहीं देता है परंतु चुनाव के दिनों में उनकी आंखों में इतनी चमक आ जाती है कि वह खुद को ही नहीं, सबको बिना बिजली के प्रकाश से इतना चमत्‍कृत कर देते हैं कि सब कुछ साफ-साफ नमूदार होने लगता है।  वोटर का वोट कोई और हथिया न ले, येन-केन-प्रकारेण सब मैदान में कूद पड़ते हैं और चरणों में दोलायमान हो जाते हैं, कई तो ऐसा आभास देते हैं कि मानो, अगले पांच बरस तक यूं ही लेटे रहेंगे, चाहे वोट मिल जाएं, तब भी। बिना वोट लिए हटेंगे नहीं, वोट मिलने के बाद भी डटेंगे वहीं। पहले वोट को लूट लें, फिर कूटेंगे करेंसी नोट।
प्रत्‍याशी की मंशा को भांप कर वोटर ने मेंढक की तरह इधर-उधर उछलना कूदना शुरू कर दिया है। प्रत्‍याशी भी चाह रहा है कि वह भी वोटर के पीछे अपना तन, मन और धन लेकर कूदता रहे और उसकी कूदान के कारण उसे अपनी आंखों से ओझल न होने दे। प्रत्‍याशी के साथ उसके गुर्गे विभिन्‍न वैरायटियों की मदिरा  देसी, विदेशी, ब्रांडिड, व्हिस्‍की, रम मतलब जिससे नशा हो, लेकर प्रत्‍याशी के इशारे पर फुदक रहे हैं। उनके कंधों पर बादाम, काजू, चिलगोजे, पिस्‍ता आदि सूखे मेवे की बोरियां लदी हुई हैं। वोटरों का ऐसा है बसंत, साधु और संतों का हो गया है अंत। कई गुर्गे स्‍थूलकाय हैं परंतु वे भी अपनी सक्रियता को कम नहीं आंकने देना चाहते हैं। इसके लिए उन्‍होंने कई प्रकार के जुगाड़ किए हैं, अपने जूतों में स्प्रिंग फिट करवाए हैं ताकि वे उछलते-कूदते भी रहें और सांस भी चढ़ती-उतरती न दिखाई दे। इससे उनकी शारीरिक अक्षमता, उनकी दक्षता का जादुई अहसास देती रहती है। प्रत्‍याशी भी अपने गुर्गों की लक्ष्‍यबेधक ताकत को आंक विभ्रम में फंसा रहता है। जबकि यह दिवा स्‍वप्‍न है, दिव्‍य स्‍वप्‍न नहीं है और जल्‍दी ही वह असलियत के ऊबड़-खाबड़ गड्ढ़ों पर परेशान हाल दिखलाई देगा और अपने ऊपर अपना गुस्‍सा उतार रहा होगा। हलक से गई, नीचे उतर चुकी होगी। मदिरा और मेवों की नंगी सच्‍चाई लज्जित कर रही होगी। शर्म उसको आ रही है।
अब वोटर को लगने लगा है कि मेंढक असल में वह नहीं, वह है। वह कौन है .....  वह कौन है ...... जो वोट लूटता है। वोटदाता मेंढक की तरह उछलता रह जाता है, उसे मालूम भी नहीं चलता कि कब मेंढक रूपी बहुरूपिया प्रत्‍याशी अपने गुर्गों और दिखलाए गए दिवा स्‍वप्‍न के बल पर उसका वोट हथियाकर ले जा चुका है और वह सदा की तरह इस बार भी हाथ मलता रह गया है। वह तो ढके हुए हाथियों के परदे उतरने की इंतजार में रहा कि जब परदे उतरेंगे तो वहां एक सीढ़ी लगी हुई होगी और वह उस सीढ़ी के जरिए हाथी की पीठ पर सवारी करते हुए अपने वोटदान करने के लिए प्रस्‍थान करेगा। एकाएक तभी उसे अपने गाल पर तमाचे का अहसास होता है, वह तमाचा असल में हाथ की करामात है, इसी कर (हाथ) की मात ने उसे इन चुनावों में फिर से करारी मात दी है। उधर हाथी, साईकिल, लैम्‍प, तराजू, ऊंट, झंडे, डंडे, फूल, कमल इत्‍यादि उसे मारने-मरोड़ने पर बुरी तरह आमादा हैं। वोटर इन चिन्‍हों की दलदल में ऐसा फंस गया है कि ऐसा अहसास हो रहा है कि सब ही उसके दुखों के तारणहार हैं। जबकि वे सब अपनी मिलीभगत पर मुदित हो रहे हैं कि हमसे बचकर भी वोटर हमारे पास ही आएगा। बचके .... बचके .... कहां जाएगा तू ... वोटर ... टर्र टर्राएगा ... वोटर और प्रत्‍याशी मार लेगा विजय का सिक्‍सर। उसके साथ उसकी 60 बेईमानियां होंगी, 600 कार‍स्‍तानियां होंगी और होंगी उसके साथ ईवीएम की तकनीकी खामियां। उसे तो हर हाल में जीतना है। हर साल बसंत आता है। चुनाव पांच साल बाद आने वाला चुनावी बसंत है। नेताओं का ऐसा है बसंत कि जीतना उसका स्‍वप्‍न नहीं , यथार्थ है और हारना वोटर की असलियत। तो क्‍या आप भी बसंत की इस ऋतु में अपना वोट बेचने जा रहे हैं ?

मैनपुरी मैन पवन कुमार




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     15 अगस्त1947 में भारत स्वतंत्र हुआ. हाँ यदि  नेहरु जी को अपने सुप्रसिद्ध भाषण ''ट्राइस्ट विद डेस्टिनी'' देने की लालसा न होती तो भारत 14 अगस्त, 1947 को ही स्वतंत्र हो जाता अन्य देशों की भांति भारत ने भी लोकतंत्र की परम्परा को अपनाया 2 वर्ष11 माह व 18 दिनों के कड़े परिश्रम के पश्चात विश्व के विशालतम भारतीय संविधान का निर्माण किया गया तथा 26 जनवरी1950 को इसे लागू किया गया और इस प्रकार भारत एक गणतंत्र देश बना तो साथियो आप सभी को इस गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ आज के इस विशेष दिवस पर हम आपको मिलवाने जा रहे हैं एक विशेष व्यक्ति से जो प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ हिंदी ब्लॉगर भी और हिंदी माँ सेवा हेतु सदैव तत्पर रहते हैं आइये मिलते हैं पवन कुमार जी से

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