आलू निचोड़ कर बिजली बनाई : दैनिक हिंदी मिलाप 17 जनवरी 2014 में संपादकीय पेज पर प्रकाशित


नए साल का आनंद : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ 'उलटबांसी' में 1 जनवरी 2014 को प्रकाशित


मुन्‍नाभाई के जन्‍मदिन पर 'कुर्सी की किस्‍मत का खिलना' : दैनिक मिलाप 14 दिसम्‍बर 2013 को प्रकाशित



तहलका का हलका होना : दैनिक हरिभूमि 4 दिसम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


'रामलीला' की आधुनिक लीलाएं : दैनिक हिंदी मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 30 नवम्‍बर 2013 में प्रकाशित



भारत रत्‍न बनाम महाभारत रत्‍न : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ उलटबांसी 20 नवम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


यह तोता है खुदगर्जी का : दैनिक नेशनल दुनिया स्‍तंभ 'चिकोटी' 8 नवम्‍बर 2013 अंक में प्रकाशित


जांच कर लो जी, सत्‍ता की फिज़ा में गुंजायमान होती यह आवाजें पीएम की हैं। बात यह है कि निडर होना, चाहे पीएम की फितरत नहीं है पर जब जांच पालतू तोते ने ही करनी है तो वह क्‍यूं डरें। तोते का रंग हरा है इसलिए उनके गुनाहों को हरी झंडी दिखा दी जाएगी। तोते को सिखाया गया है कि जब जांच हो तो जो रटा रटाया है, वही बोलो टिम्‍बकटू।
हम मियां हैं, महोदय नहीं इसलिए मिट्ठू-मिट्ठू करते हैं। तोता खुदगर्जी की मिसाइल है। यह मिसाइल अपने मालिक को चोटिल नहीं करती पर सामने वाले को नहीं बख्‍शती। तोताचश्‍म हमारा मिट्ठू  है।  मिट्ठू  बोल  नहीं सकता कड़वा, मीठा ही बोलेगा, मिठास ही घोलेगा। इंसान के भाव के मसले पर तोता नियत शर्तों का उल्‍लंघन नहीं करता। फिर तोता हो या सीबीआई मीठा ही मीठा गाता है, मीठापन ही सत्‍ताधारियों को लुभाता है।
 
तोता चाहे जंगली हो, पर नेताखोर नहीं होता और न होता है आदमखोर, पक्षीखोर भी नहीं होता है। घर में रहे तो पिंजरे में रह कर राम राम रटता है,  पेड़ की खोह में रहे तब भी राम राम, आप भले ही उससे आसा पाल लें पर वह नहीं पालता। तोता है मीठेपन का सोता। पीएम जानते हैं इसकी खूबियों को पहचानते हैं। तोता पक्षी है, घोड़ा नहीं है। झांसी की रानी के घोड़े चेतक की वफादारी इतनी जल्‍दी भूल गए क्‍या। पालने वालों ने तो हाथी भी पाले हैं, उनके बुत बना पार्कों में सजाए हैं।

हमने उसे झाडू है थमाई कि चौबीसों घंटे करता रहे अपने घर को हमारा समझ उसकी साफ सफाई। हम उसकी अपाइंटमेंट अथॉरिटी हैं, इसलिए वह हमारे आभारी हैं। उनकी पसंदीदा लाल मिर्च के मालिक हम हैं, वह कैसे हमारे उलट बोलेंगे, नहीं भी देंगे तब भी किसी तीसरे को जख्‍मी करने के लिए अपनी चोंच खोलेंगे। तोते वफादारी की मिसाल हैं। तोते करते हैं गर परिहास तब भी मालिक की  ऊंगली का नहीं करते सत्‍यानाश। मालिक की ऊंगली अपनी चोंच में बहुत एहतियात के साथ दबोचते हैं।

तोते मोतीचूर, बेसन के लड्डू नहीं खाते, हलवा भी नहीं । इससे यह मत समझ लीजिएगा कि वह खोते होते हैं, उन्‍हें मीठे की तमीज नहीं होती है।  आप सोच रहे हैं कि तोते के लाल व हरी मिर्च खाने के मूल में शुगर होना हो सकता है। पर यह तोता है खुदगर्जी का। यह करता तो मिट्ठू मिट्ठू है पर खाता मिर्ची है। पोलेपन को छिपाने में माहिर तोते की तुक सोते से मिलती है । सोते समय भी वह खुर्दबीन सरीखी अपनी उल्‍लूमयी गोल-गोल आंखों को नचा-मटका कर, उलट पलट करके गच्‍चा देता है, इसका दिया गया गच्‍चा इसलिए मजबूत होता है क्‍योकि वह स्‍वार्थसिद्धि का हुनरमंद खिलाड़ी माना गया है।

सोना सोना सोना : हरिभूमि 25 अक्‍टूबर 2013 अंक में प्रकाशित


रोजगार ही रोजगार : कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस 19 अक्‍टूबर 2013 में प्रकाशित


मीठी सदा बोलती वाणी (कविता)



सबकी हूं मैं गुडि़या रानी
मीठी सदा बोलती वाणी
मंद मंद मुस्‍काती हूं
सबके मन को भाती हूं।
- दादाभाई के सत्‍यवचन।

तेलंगाना - तेल में तैराकी या गाना



हसीना क्‍या चाहेअगर हसीनाओं की चाहत पर चाहें और उनकी चाहत पूरी करने लगें तो सारा जहां ही कम पड़ जाए। पर यहां पर बात करेंगे तेलंगाना की। हसीनाओं और तेल का किस्‍सा बहुत पुराना है क्‍योंकि हसीनाओं को हसीन फिगर बनाए रखने के लिए नृत्‍य के रियाज़ में जुटे रहना होता है। पर हसीनाओं की कुछ शर्तें भी होती हैं। इनमें से कुछ को नाचने के लिए नौ मन तेल की जरूरत होती है। एक बेहद प्रचलित लो‍कोक्ति है कि ‘न नौ मन तेल होगान राधा नाचेगी।‘ कुछ हसीनाएं जो नाचना जानती नहीं हैं पर अपने को कमतर  भी साबित नहीं होने देना चाहतीवे आंगन को टेढ़ा बतला कर अपना काम निकाल लेती हैं। तेल और आंगन की रिश्‍तेदारी के नए आयाम कुछ इस तरह से कायम हो रहे हैं कि नौ मन तेल को आंगन में लुढ़काया जाए और तेल में से और तेल के निकलने के रास्‍ते बंद कर दिए जाएं तो जो स्थिति बनती है वह नृत्‍य की कमतैरने की अधिक होती है। फिर तेल में नाचने की कोशिश की तो मुंह जरूर टूटेगा इसलिए उसमें तैरना ही मुफीद रहेगा। अब तेल रिफाइंड रहेगा या सरसों का,इस बारे में पाठक और पाठिकाओं की सलाह को वरीयता दी जाएगी क्‍योंकि नाच उन्‍होंने ही देखना है।
वैसे ही जैसे तेलंगाना को राज्‍य का दर्जा दे कर गाना शुरू किया जाए। अब उस राज्‍य की प्राथमिकताएं तय करना तो नागरिकों का हक होना चाहिए जबकि इस हक पर डकैती नेता डाल लेते हैं। वे राज्‍यों के टुकड़े भी इसलिए ही कर सकते हैं कि उन टुकड़ों पर कुत्‍ता झपटी कर अपना घर भर सकेंचाहे जनता का पेट भरे अथवा नहींइसकी चिंता किसी को नहीं रहती है।   
अब तेल में तैरते हुए गाने में माहिर तो नेता ही हो सकते हैंयह विशेष कार्य न तो नृत्‍यांगनाओं के बूते का है और न नागरिकों के बस का। तेल में तैरनातेल में गानान नौ मन तेल होनानाच न जाने आंगन टेढ़ा,तेल और तेल की धार देखनाइसमें से कितने ही गुण नृत्‍यांगनाओं के नहीं नेताओं के चिकनाई आइटम कहे जा सकते हैं। जबकि  दोनों शब्‍दों का आरंभ न से ही होता है। फिर न  न करते प्‍यार तेल से कर बैठे,जबकि प्‍यार राज्‍य के बंटवारे पर लुटाया जा रहा हैइस प्रकार का  गीत लिखने के लिए प्रसून जोशी तो प्रयास करने से रहेगुलजार भाई कोशिश कर भी लें अन्‍यथा मुझे ही लिखना पड़ेगा। पर मेरी राय में यह कार्य बयानवीरों के लिए मुश्किल नहीं हैचर्चा भी खूब होगी। कुछ गलत कह भी दिया तो उससे पलट भी सकते हैं।
और हम सब फिर से एक बार तेलंगाना तेलंगाना खेल सकते हैं। भविष्‍य में हर नगर का राज्‍यराज्‍य में प्रत्‍येक घर एक राज्‍य,पर टकराव तो तब भी खत्‍म होने का नहीं हैजब सब अपनी अपनी पगार के खुद मुख्‍तार होंगे और यही मुखियागिरी सभी दुखों की दुखियारी मां के रूप में सम्‍मान पाती रहेगी।

-    अविनाश वाचस्‍पति

चुनौतियां लेखन की : डीएलए दिनांक 27 सितम्‍बर 2013 में प्रकाशित


गरीबी पर योजना आयोग बार बार मुद्दे को गर्म कर देता है मानो ठंडे खाने को गर्म कर रहा हो और हर बार अपनी ही हदों से बाहर उबल-उबल कर गिरने लगता है।  ऐसे में लेखक के लिए जरूरी है कि वह गरीबी जैसे सनातन पर पुराने घिसे-पिटे विषय पर नए सिरे से ऐसा लिखे कि दोहराव न हो और पुराना छपा दोबारा छपवाने से सदा परहेज करे। जबकि दोनों तरह के लेखक पाए जाते। यह मत समझिए कि लेखक दो तरह के ही होते हैं। कुछ लेखक मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में खूब अच्‍छी तरह से लिख लेते हैं, कुछ ऐसा लिखते हैं कि दोनों का बराबर संतुलन बना रहे। इनमें से कुछ को शर्तिया नेता होना चाहिए था, पर वे न जाने किन मजबूरियों के चलते लेखक बन गए।

जो छप जाए अच्‍छा, कई बार अलग-अलग दोनों तरह का ही छप जाता है। यह वे लेखक होते हें जो लिखने से अधिक किसी भी तरह छपने को वरीयता देते हैं। इंटरनेट के दौर में जो लेखक अपनी रचनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों के अखबारों में छपवाते हैं, यह विचारों को अधिक व्‍यापक तौर से अधिक पाठकों तक पहुंचाने का उनका ऐसा तरीका है जो एकदम सही है। इसका कारण पूछने पर उनका कहना है कि कुछेक अखबारों के संपादक आजकल की सूचना क्रांति के इस महज सस्‍ते दौर में रचना मिलने पर उसके छपने या न छपने की सूचना देने में अपनी हेठी समझते हैं। जबकि इसके विपरीत कुछ स्‍वीकृति की सूचना के साथ प्रकाशन के दिन की भी जानकारी देते हैं। उधर विषय पुराना होने पर उनका लेखन आउटडेटेड हो जाता है। इसलिए वे लिखने के बाद न छपने का रिस्‍क नहीं लेते हैं और जो संपादक बतला देते हैं, उन्‍हें भेजे/छपे लेख मजाल कि कहीं पर दोबारा छप जाएं।

वह बात दीगर है कि दूरदराज के अखबार उनकी रचनाओं को हूबहू अपने अखबार में छाप लेते हैं और उसकी सूचना भी नहीं देते हैं। कई बार वे तो वे रचनाकार का नाम प्रकाशित करना भी जरूरी नहीं समझते हैं। ब्‍लॉग से अच्‍छी रचनाओं का चयन करके भी अखबारों में प्रकशित किया जाना एक स्‍वस्‍थ परंपरा है। जबकि इस पर ब्‍लॉग लेखक इसलिए कुपित पाए जाते हैं कि उनकी रचना तो छाप दी गई लेकिन न तो उसके प्रकाशन की सूचना ही उन्‍हें मिली और न ही प्रकाशित रचना की स्‍कैन प्रति अथवा लिंक ही, ऐसे में पारिश्रमिक या मानदेय की उम्‍मीद करना तो बिल्‍कुल बेमानी है।

मेरा मानना है कि बेहतर विचारों का प्रकाशन अवश्‍य होना चाहिए और उन्‍हें अधिक से अधिक पाठकों तक किसी भी जरिए से पहुंचना चाहिए। पर अधिक उत्‍साही लेखक इससे यह न समझ लें कि वे अपनी रचनाओं के इश्‍तहार छपवाकर अखबारों में डलवा या नुक्‍कड़, चौराहों और मोहल्‍ले में बंटवा सकते हैं। वे कर सकते हैं पर उन्‍हें इसलिए नहीं करना चाहिए क्‍योंकि यह एक तो सस्‍ती लोकप्रियता वाला हथकंडा है, दूसरा वे कोई दवाईयों, स्‍कूल, नृत्यशालाओं, जिम, साइबर कैफे का विज्ञापन तो कर नहीं रहे हैं।
इससे निष्‍कर्ष यह निकलता है कि बेहतर लिखो, अपना पाठकवर्ग तैयार करो, वह सकारात्‍मक लिखने और पाठकों तक पहुंचने से ही तैयार होगा।

झूठ का लालकिला : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 10 सितम्‍बर 2013 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित


सब मीडिया की करतूत : दैनिक हरिभूमि 29 अगस्‍त 2013 में प्रकाशित व्‍यंग्‍य


तेजाब, तमाशा और सरकार : डीएलए 31 जुलाई 2013 में प्रकाशित


लोग बाग तो आम के बाग बगीचे में, यहाँ वहां, जाने कहाँ कहाँ शराब पीकर, बीड़ी पीकर, गुटखा खा चबा कर गांजे सुल्फे के दम मारकर खुशी खुशी परलोक को कूच कर रहे हैंसरकार इन लोगों के मरने के एकदम पक्ष में है और वह करे तो क्या करे  उसने तमाम नशों के खिलाफ कड़े कानून तो बना रखे हैंपर इन नशों के निर्माताओं से उसका पुराना याराना है .... कितने ही लोग पंखों पर रस्‍सी चुन्‍नी बांधकर खुदकुशी कर रहे हैं तो क्‍या सरकार सीलिंग पंखों को सील कर देरस्‍सी पर रस्‍सी बांध दे और चुन्‍नी को फांसी चढ़ा दे। रेल की पटरियों पर रेलों के सिवाय किसी के भी चलने सोने पर रोक लगा दे। मोबाइल कंपनियों को कह दे कि गाना सुनने की सुविधा नहीं देंगे क्‍योंकि लोग राह चलते कान में सुनते हुए बसों के नीचे और रेल की पटरियों पर मुर्दाघर बना रहे हैंपुलिस को और गिरा दे जिससे उसके लिए कमाई के और रास्‍ते खुल जाएं और वह ज्‍यादा बिगड़ जाएं

सरकार मतलब जिसके सर पर से कार भी गुजर जाए तो चिंतित न हो जबकि दीवाने लोग इसका गलत मतलब निकाल रहे हैं कि जो सरक सरक कर चलेजो घिसटती रहेजो चुप रहे और जो अंधी है वह सरकार। मतलब शरीर के सारे दोष सरकार में हैं। सरकार को इंसान का शरीर ही मानना है तो उसे गलती करने का हक भी तो दो।  गलती करने से सरकार और इंसान दोनों बनी रहेगी। फिर आप किसकी शिकायत किससे करोगे।

आज सरकार तेजाब पर रोक लगा दे। कल कहोगे कि तेल और दूध गर्म करने पर भीलगाए।  गर्म तेल किसी के उपर डाला जा सकता है,  दूध गर्म करने पर किसी क हाथकी ऊंगलियां बरतन बेध्‍यानी में पकड़ने सेबुरी तरह झुलस गईं। परसों कहोगे कि पब्लिक को बिजली का करंट नहीं मिलना चाहिएउसे छूने से लोग मर जाते हैं। उसके बाद बसें बंद करवाओगेट्रैफिक पर प्रतिबंध लगवाओगेघर से बाहर निकलना बंदछत के नीचे रहोगे तो मरोगेछत पर चढ़ोगे तो भूकंप आ गया तब मरोगे।

अब सरकार सरकार है कोई भगवान तो है नहीं कि सबको जिंदा रखने की जिम्‍मेदारी उसी की है। अगर कोई मरेगा नहीं तो संसार कैसे चलेगानए लोग कहां समाएंगे और जब कोई मरेगा नहीं तो शमशान वाले तो भूखे मर जाएंगे। कोई बीमार होकर अस्‍पताल नहीं पहुंचेगा तो अस्ताल और डॉक्‍टरों की मौत पक्‍की है। इतना खर्च करके डॉक्‍टर बने हैंअस्‍पताल खोले हैं, उन्‍हें कुछ कमाने धमाने दो। सच्‍चाई से डरो मत, सामना करो, कोरी भावनाओं में न बहो। जिंदगी जरूरत है तो फजीहत भी है जिंदगी। फजीहत से छुटकारा पाने के मौत जरूरी है, न कि सब तरफ दंगे हो जाएंमारधाड़ मच जाए और कोई सचमुच में मरे नहीं। इस सब से तो भगवान का तमाशा बन जाएगा।

अब आप चाहते हो कि अपने भगवान का तमाशा बने। सरकार का तमाशा बने और सब तमाशबीन। वैसे एक बात तो है कि तमाशबीन बनने के लिए बीन बजाना आना जरूरी नहीं हैआप क्‍या सोचते हैंचैन की बीन बिना सीखे बजाते रहें या यूं ही मस्‍तरामबनकर जिंदगी के दिन गुजार दें। 

कविता का तराशना : दैनिक हिंदी मिलाप में 22 जुलाइ्र 2013 अंक में प्रकाशित


इंसान से आदमी बनने का सफर : दैनिक हिंदी मिलाप 'बैठे ठाले' स्‍तंभ 17 जुलाई 2013 में प्रकाशित


टमाटर की कड़वी लालिमा : जनसंदेश टाइम्‍स 9 जुलाई 2013 में प्रकाशित



टमाटर की कड़वी लालिमा : जनसंदेश टाइम्‍स 9 जुलाई 2013 में प्रकाशित


टमाटर की कड़वी लालिमा : जनसंदेश टाइम्‍स 9 जुलाई 2013 में प्रकाशित


 
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