स्‍पॉट फिक्सिंग कानूनन वैध करो : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ तीखी नजर 21 मई 2013 में प्रकाशित


कुछ समय बाद आपको यह व्‍यंग्‍य यू ट्यूब के लिंक पर सुनने के लिए मिलेगा।

पढ़ आप नीचे सकते हैं :-


सुर्खियां न नेताओं का पीछा छोड़ती हैं न क्रिकेट का और खेल से जुड़े बीसीसीआई सरीखे संगठनों की अब पौ निन्‍यानवै का फेर हो गई है। पैसा कमाने के लिए की गई कोशिशों को कलंक कहना देश का दुर्भाग्‍य है। आदमी गिरने की हद से नीचे जा गिरे और पैसा भी न मिले तो गिरना फिजूल है। पैसा मिलने पर गिरना अच्‍छा उसूल है। आखिर अधिक पैसा कमाने से देश का तेजी से विकास होता हैकुछ को यह विकास और कुछ को यह तेजी रास नहीं आ रही है। स्‍पॉट फिक्सिंग को खिलाडि़यों और देश के नाम धब्‍बा बतलाने वालों की नाजायज कोशिशों की निंदा की जानी चाहिए। दरअसलयह जन-मन और तन का कुशल प्रबंधन है। प्रबंधन में धन आ ही गया है और सेक्‍स का रोमांच इससे नहीं बचायह बहुत अच्‍छी बात है। कितने ही खिलाडि़यों का तो इसे सुनकर ही मन खुश हो गया होगा। गंदे मन को तन की गंदगी के स्‍पर्श से अद्भुत खुशी मिलती है। क्रिकेट को गंदगी बतलाने वालोंगंदगी का गंदी होना अगर अश्‍लीलता है तो दाग के अच्‍छे होने को आप कैसे परिभाषित करेंगे।  
भाव काटना और भाव खाना ने फिक्सिंग के सौंदर्यबोध में बेतरह इजाफा किया हैउसके लिए हम इन खिलाडि़यों के ऋणी होना तो दूरउन्‍हें दोषी तक बतला रहे हैं। शब्‍दकोष में मिले इस तरह के योगदान से साहित्‍य दिनोंदिन समृद्ध हो रहा हैजैसे बुकीपंटर वगैरह। पंटरों के बारे में आपको जान लेना चाहिए कि वे हार-जीत दोनों पर सट्टा खेल कर खेल में समान भाव बनाए रखते हैंइसके लिए उनका सम्‍मान करना चाहिए। सिर्फ व्‍यंग्‍यकारों की कलम ही काटती है, इस भ्रम में जीने वालों को अब अपनी नजरें सीधी कर लेनी चाहिएं। कलम काटने की मिसाल क्रिकेट के खेल में उपयोग किए जाने के प्रमाण मिले हैं। फिक्सिंग सैंटिंग के साथ मिलकर जो रोज नए प्रतिमान कायम कर रही हैउससे हैरान नहीं होना चाहिए। यह भी संभव है कि टेस्‍ट क्रिकेटरों को सलाखों के पीछे ले जाना भी इस विधा के उन्‍नयन का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा हो। फिक्सिंग के नायाब धंधे के गौरव में बढ़ोतरी व कीर्तिमान हासिल करने के लिए यह सब इनके प्रमोशन का एक आयाम लग रहा है।
जीजू नाम ऐसे लग रहा हैमानो संतश्री से इनका जीजा साले वाला रिश्‍ता परवान चढ़ने को बेकरार हो। तभी वह रात भर जेल में सुबकते रहे। न पैसा ही रहा, न जीजू मिला। जबकि संत सब मोह मायाओं और सम्‍मोहन से मुक्‍त माने गए हैं। एक फेमस क्रिकेट खिलाड़ी ने कहा है कि इनके खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह इनके जीवन पर रोक लगाने की मानिंद होगाजो बिल्‍कुल ठीक नहीं है।  जब पांच साल पहले एक क्रिकेट खिलाड़ी ने इस संत के एक चांटा रसीद किया थातब उसे जरूर मालूम हो गया होगा कि यह देश के विकास में अधिक उतावला होकर नाम कमा लेगा और हम सबको इस मामले में बुरी तरह पछाड़ देगा। वह चांटा क्रिकेट फिक्सिंग की नई विधा स्‍पॉट फिक्सिंग’ का शैशव काल थाजो अब जाकर किशोरावस्‍था तक पहुंचा है। क्रिकेट की खासियत ही है कि इसमें चांटा ही नहींडब्‍बा भी बोले तो खूब आवाज आती है। अभी- जानकारी यह भी लीक हुई है कि मैच फिक्सिंग कानूनन जुर्म नहीं है और खिलाडि़यों को धर लेना कानून के अपमान का मामला बन रहा है। गेंद चंचल होती है और लक्ष्‍मी को भी चंचला माना गया है। कहा तो यह भी गया कि टी शर्ट उठाकर आसमान की तरफ देखने सेअच्‍छा पैंट उतारकर जमीन की तरफ देखना गर्वित होने का अहसास देता है। बिग बॉस इन सबको अगले सीजन में बुलाकर अवश्‍य धमाल मचाने की जोड़-तोड़ में जुट गए होंगे। इसलिए इन्‍हें सलाखों से बाहर निकाल दिया जाना चाहिएचाहे बाहर निकालने की एवज में इनसे लाखों ले लिए जाएं। हकीकत यह भी है कि स्‍पॉटकभी फिक्‍स नहीं हो सकताजब मिट जाए तब भी फिक्सिंग बनती हैकिसने कहा कि मिटाना फिक्सिंग नहीं हो सकती। इस कलाकारी को धूर्तता बतलाने वालोंयह समन्‍वयन यानी कोऑर्डीनेशन की जीवंत मिसाल है। समन्‍वयन की त्रिवेणी क्रिकेट खिलाडि़यों के ही नहींइससे जुड़े तीरंदाजों के  तनमन और कार्यों में उछाल मार रही है। जितना लोकप्रिय और मनोरंजक क्रिकेट स्‍पॉट फिक्सिंग’ के जरिए हो गया हैइस पर रोक लगाना इसे अवनति के गर्त में ढकेल देगा।  वह खेल ही क्‍याजिसे खेलते-खेलते मन में खिलवाड़ भावना की हिलोरें न महसूस होने लगें। सरकार को इसके उत्‍थान के लिए संसद में एक बिल लाना चाहिए और इसे क्रिकेट की बेहतरी के मद्देनजर कानूनन जायज बना देना चाहिए।

शरीफ तोते की मीठी चुस्‍की : जनसंदेश टाइम्‍स 14 मई 2013 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित


चीन, चीन ही रहा चीनी न हुआ : दैनिक जनवाणी 7 मई 2013 अंक में प्रकाशित


मन रे गा, अब मिलेगा जॉब कार्ड : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ 'उलटबांसी' 30 अप्रैल 2013 अंक में प्रका‍शित


सोशल मीडिया और पतली कमर : दैनिक जनवाणी 23 अप्रैल्‍ 2013 स्‍तंभ तीखी नजर में प्रकाशित


सच्‍चे प्‍यार की निशानी, गर्म कालों की कहानी है : सृजक पत्रिका स्‍तंभ व्‍यंग्‍यबाण अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित


हिन्‍दी फिल्‍मों की रसमलाई है प्‍यार : दैनिक मिलाप स्‍तंभ बैठे ठाले में 12 अप्रैल 2013 को प्रकाशित


शहद की चिडि़या देश हमारा : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ उलटबांसी 9 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित


मोबाइल एप्स जो बचाएं पैसे : अमित द्विवेदी का उपयोगी आलेख : राष्‍ट्रीय सहारा 7 जुलाई 2013 को उमंग परिशिष्‍ट में प्रकाशित

मोबाइल एप्स जो बचाएं पैसे
अगर पिछले 10 बरसों में हमारे देश में किसी चीज की सबसे अधिक र्चचा हुई है तो वह है यहां बढ़ती महंगाई। पिछले कुछ सालों में पेट्रोल के रेट जहां दोगुने से भी अधिक बढ़ गए हैं, वहीं खाद्य पदार्थो के दामों में बेहिसाब वृद्धि हुई है। लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जहां आप पैसे बचा सकते हैं। आज बात ऐसे एप्स की जिससे आप पैसे बचा सकते हैं जो अकसर आप फोन करने में खर्च करते हैं। आपको रू-ब-रू करवाते हैं कॉलिंग एप्लीकेशंस से जिन्हें आप अपने मोबाइल में डाउनलोड करके इस महंगाई के दौर में कुछ राहत की सांस ले सकते हैं। ऐसे ही कुछ एप्लीकेशंस-
निंबज यह एंड्रॉयड, आईफोन, विंडोज फोन, सिंबयन, ब्लैकबेरी, जावा फोन और पीसी पर काम करता है। यह एक मल्टीटास्किंग एप है जिसे दुनियाभर में 10 करोड़ से भी अधिक उपभोक्ता इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे न सिर्फ एक- दूसरे को नि:शुल्क मैसेज आदान-प्रदान कर सकते हैं बल्कि वायस चैट भी कर सकते हैं। यह एप्लीकेशन 200 देशों में उपलब्ध है। इसके बारे में कहा जाता है कि हर सेकंड एक नया उपभोक्ता इस एप्लीकेशन को अपने मोबाइल पर स्टॉल कराता है। यह टैबलेट और मैक पीसी के साथ-साथ ब्लैकबेरी को भी सपोर्ट करता है। यह भारत में उन लोगों के लिए बेहद अच्छा तथा सस्ता एप्लीकेशन है जिनके अपने प्रिय विदेशों में रहते हैं। इस एप्लीकेशन के जरिए लोग हर समय अपनों के साथ सारी सरहदें पार करके संपर्क में रह सकते हैं। इसके जरिए न सिर्फ बातचीत संभव है बल्कि एकदू सरे की लाइव तस्वीर भी देखी जा सकती है। इसके साथ-साथ, यदि आपने यह एप्लीकेशन स्टॉल किया है तो आप आईबीएन लाइव की न्यूज अपडेट, लाइव क्रिकेट अपडेट, ट्विटर अपडेट, स्टॉक अपडेट, विकीपीडिया जानकारी, यूट्यू ब का इस्तेमाल, फिल्मों की समीक्षा, कार की कीमत और भविष्य की जानकारी भी हासिल कर सकते हैं। यह एक बेहद ही उपयोगी एप्लीकेशन है जिसे आप पूरी तरह से बिना कोई पैसा दिए अपने मोबाइल पर स्टॉल कर सकते हैं।
स्काइप इस एप्लीकेशन को माइक्रोसॉफ्ट कॉर्प ने 2003 में शुरू किया था। गुणवत्ता वाले वायस चैट के कारण यह काफी लोकप्रिय हुआ और खासकर वे लोग इसका प्रयोग करने लगे जिनके अपने दूर देशों में रहते थे। लेकिन अब यह मोबाइल एप के रूप में अपनी उपयोगिता अच्छे से साबित कर रहा है। यह एंड्रॉयड, आईफोन, विंडोज फोन, सिंबयन और पीसी पर काम करता है। यह मल्टीटास्क वाला एप्लीकेशन है। इसमें तुरंत मैसेजिंग के आदान-प्रदान के अलावा ग्रुप बनाकर एक साथ कई लोगों से वीडियो चैट कर सकते हैं। यदि आप अपने मोबाइल को नेटकार्ड के माध्यम से प्रयोग करने के बजाय वाई-फाई से कनेक्ट करेंगे तो यह एप्लीकेशन और बढ़िया तरीके से काम करेगा। इसके अलावा, आप स्काइपी क्रेडिट खरीदकर कम दर पर कॉल कर सकते हैं। पूरी दुनिया में इसके अब तक 60 मिलियन उपभोक्ता हैं।
ओवो यह एप्लीकेशन उन लोगों के लिए है जो वीडियो चैट करना पसंद करते हैं। इसे ओवो एलएलसी द्वारा 2007 में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज, मैक ओएस एक्स, एंड्रॉयड और आईओएस प्लेटफॉर्म के लिए तैयार किया गया था। इसमें एक साथ 12 लोग वीडियो चैट कर सकते हैं। यह वीडियो चैट 100 मिनट लंबा भी हो सकता है और इसे यूट्यूब पर भी शेयर किया जा सकता है। इसके जरिए 50 एमबी तक की फाइल को सुरक्षित ढंग से भेजा जा सकता है। यह कई मामलों में माइक्रोसॉफ्ट के स्काइपी जैसा है लेकिन उपयोगकर्ता अपने अनुभवों के आधार पर यह बताते हैं कि इसकी वीडियो गुणवत्ता सबसे अच्छी है।
फिंग इसमें फ्री ग्रुप वीडियो चैट की सुविधा है। इसकी खूबी है कि एक साथ इसमें चार लोग एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। यह एप्लीकेशन आईओएस, एंड्रॉयड और सिंबयन को सपो र्ट करता है। यह एक बेहतरीन एप्लीकेशन है जिसे दुनियाभर के लाखों लोग इस्तेमाल कर रहे हैं।
इन्हें भी आजमा सकते हैं यदि आप इनके अलावा कोई और कॉलिंग एप प्रयोग करके देखना चाहते हैं तो वी वैट, टॉक एट टोन और वाइबर को भी चुन सकते हैं। इनके संदर्भ में आपको और विस्तार से जानकारी इंटरनेट पर मिल जाएगी। इनका प्रयोग करके फोन के लंबे-चौड़े आने वाले खर्चे पर काफी हद तक लगाम लगा सकते हैं। जब प्रयोग करें कॉलिंग इस तरह के एप्लीकेशन में अपनी कॉलिंग सूची में उन्हीं को रखें जिन्हें आप अच्छे से जानते हैं। किसी अनजान व्यक्ति को इसमें जगह न दें। इसका इस्तेमाल किसी तरह के अवांछित या गैरकानूनी कायरे के लिए न करें क्योंकि अकसर आपका वीडियो कहीं और नजर आता है। हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि तकनीक जितनी सहूलियत प्रदान कर रही है उतना ही इसका दुरुपयोग भी संभव है, इसलिए किसी भी तरह की अनहोनी से बचने के लिए सजग रहें।
अमित द्विवेदी

एक गधे का सोचनामा : जनवाणी स्‍तंभ तीखी नजर में 2 अप्रैल्‍ 2013 को प्रकाशित




मिशन कमीशन या करप्‍शन ! : दैनिक हिंदी मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 16 मार्च 2013 में प्रकाशित


कला और गला (कविता)

फांसी लगाना
ऐसी कला है
कटता जिसमें
सदा गला है ।

किंतु पिघलता
नहीं मिला है
किसी को गिला
किसी को मिला।

लगता है चल पड़ा
गंदा यह सिलसिला
गला काटो
बला टालो।

रंग लाएंगे 'अन्‍ना' के दांत : 'गन्‍ने' पर घिस जाने के बाद (कविता)


'अन्‍ना' का राजनीति से 'मित्रता दिवस' मतलब 'फ्रेंड्सशिप डे' : इस 'शिप' में क्‍या हश्र होगा 

'
अन्‍ना' को भाया
राजनीति का 'गन्‍ना'
इसे चूसने का करेंगे
भरपूर प्रयास
अपने साथियों के साथ।

क्‍या रंग लाएगा गन्‍ना
अन्‍ना के दांतों से
पीसे जाने के बाद
दांत हो जाएंगे बेकार अथवा
भ्रष्‍टाचार रूपी ज्‍यूस
बह जाएगा नाली में
ज्‍यों मज़ा आता है
गाली में।

ताली में
बाली में
खाली में
डाली में
पाली में
जाली में
....

आजकल चश्‍मा गूगल है (कविता)


जिसका चश्‍मा उतारो
वही व्‍यंग्‍यकार निकल आता है
मुझे तो बहुत भाता है
अरे भाई, व्‍यंग्‍य नहीं
चश्‍मा
चश्‍मा जो विचारों का है
चश्‍मा जो पानी का है
पानी जो ठंडा है
ठंडा तो मटका भी है
पर उसे पी नहीं पायेंगे
जो होगा अपने पास
उसे भी जलबोर्ड पर
प्रदर्शन के समय जाकर
फोड़ आयेंगे
फिर पानी के लिए
मटका तोड़
सुराही की गर्दन मरोड़
अभियान चलायेंगे
यह जघन्‍य अपराध है
क्‍या इससे चढ़ता
पानी पाने का 
ग्राफ है
जिस बोतल में देखो
जिस बरतन में झांको
जिस कुंए में ताको
पानी नहीं है
पानी अब नहीं मिलता
आंख में भी
आंख पर भी
मिलता है चश्‍मा
चश्‍मा वही जो
विचारों का है
चश्‍मे दी कि गल है
आजकल चश्‍मा गूगल है।


विचार नकद हैं
नहीं उधार हैं
उसी में तो
धार है
तीर है
किनारा है।

- अविनाश वाचस्‍पति विरचित

कागज की किश्‍ती और दिल्‍ली जलबोर्ड का पानी - अविनाश वाचस्‍पति

आया सावन घूम के


फेसबुक के मित्र हम
कागज की किश्तियां
लेकर उस पर बैठकर
कर रहे हैं मानूसन 
का सफर आज शुरू

जो जो चाहें चलना
अपनी अपनी किश्तियां
मतलब कागज लेकर
हाजिर हों
जिस गुणवत्‍ता की चाहें
उस क्‍वालिटी का पेपर लाएं
किश्‍ती कागज की बना देंगे



बरसात नहीं आई तो
दिल्‍ली जलबोर्ड से पानी
का टैंकर मंगवा लेंगे।

किश्‍ती में बैठने 

और उसे धकेलने
का जोखिम मस्‍ती करने
वाले का होगा

नियम और शर्तें व्‍यापक हैं
इससे भी अधिक
इसलिए अपने जोखिम पर
पधारें लेकर बोतल

खाली बोतलें लेकर
किश्‍ती में सफर
करने की नहीं
होगी अनुमति
भरी बोतलें तो
बिल्‍कुल भी नहीं

अब यह सोचना है आपने
कि सफर मस्‍ती का कैसे
कर सकते हैं शुरू
न खाली करके बोतल
ले जा सकें
भरी बोतल एलाउड नहीं है।

जो और जितना अलाउड है
बतला दिया है
आप किश्‍ती लेकर हाजिर हों
और किश्‍ती-शुल्‍क सुशील कुमार जोशी
के पास cash जमा करवाएं।


हिन्‍दी ब्‍लॉगर नहीं हूं मैं, मुझे फेसबुक से अन्‍नाबाबा पकड़ लाए हैं

पहचानना तो आसान है
पर जो नेता होगा
अभिनेता होगा
जानवर होगा
लल्‍लू होगा
उल्‍लू होगा
वह जरूर
कन्‍फ्यूज होगा।

कोई इसे बतलाएगा कुत्‍ता
कोई कहेगा उल्‍लू
कोई कहेगा हुड़कचुल्‍लू
पर कोई नहीं कहेगा
चुल्‍लू भर पानी
पानी की शीला वाली कहानी।

देश में पानी पर भी
की जा रही है बेईमानी
बिजली बेईमान पहले
हो चुकी है
पानी बेईमान होने की
राह पर बह रहा है।

वह आता दो टूक फेसबुक के करता, फेकबुक बनाता अपनी थुलथुल काया लेकर वापिस चला जाता

वह आता दो टूक फेसबुक के करता
लाइक करता, टिप्‍पणी धरता
पोस्‍ट कभी न लगाता
जहां फंसाता, वहीं खुद फंस जाता
कहीं चेहरा सजाता सलमान का
कहीं चेहरा छिपाता अपने मेहमान का


वह आता दो टूक फेसबुक के करता
लुक अपना लड़के से लड़की में बदलता
खूब पसंद पाता
वाह वाह से मन भर जाता
टिप्‍पणी अपने घर भी ले जाता
अपनी पत्‍नी से छिपाता
बच्‍चों को भी नहीं बताता
भरमाता, दो बच्‍चों का पिता
खुद को सबसे सुंदर समझता
ताकत से अपनी खुद को खुदा समझता

लड़कियों को लुभाता
प्रशंसा में फेक गीत गाता
तब भी किसी को न भाता
चुराकर किसी की कविता
कर अनुवाद अपनी बताता
विचार चुराकर लाता
कभी किसी के, कभी किसी के
अपनी दीवार पर
अपनी टाइम लाईन पर
अपने ब्‍लॉग पर कतार में
अधेड़ महिलाओं  की लाईन लगाना

जहां कन्‍या स्‍वरूपा बनता
लाईन पुरुषों की
अधेड़ों की लगी पाता
झुंझलाता, दांत पीसता
गर्व उसका यूं ही पीस जाता।

वह आता दो टूक फेसबुक के करता
कदम अपने ब्‍लॉग पर लाके धरता
धरती पर कभी न टिकता
जिम में जाकर दम उसका मचलता
सामने आने पर सारा यूं ही निकलता।

वह आता फेसबुक को
फेकबुक बनाता
बनाता या खुद बन जाता
वह जाता
वह जाती
दूर से काया इकहरी
एक ककड़ी, एक खीरा नजर आती
वह चिल्‍लाती उसे अपना खसम बनाती
फेसबुक पर खाता अपना खोल न पाती
सारी उम्र यूं ही जुल्‍म उठाती
फेसबुक पर टिप्‍पणी पाने को तरस जाती।

सुनिए दिल्ली गान (Listen Delhi Anthem)


कविता: बनो आधुनिक पर मत भूलो सनातन इतिहास


ओ राम मेरे कैसा 
गजब ये हो गया,
आजकल का रंग-ढंग 
कैसा अजब हो गया

जो वस्त्र होता था नीचा वो ऊँचा ,
और जो होना था ऊँचा वो नीचा हो गया,
जब तक ''जोकी'' लिखा न दिखे,
इनको आता चैन नहीं ,
अगर करे कोई टोका-टोकी 

ये हो जाते बेचैन

पूरी कविता को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

हम स्कूल में इंसान बना रहे हैं या फिर जानवर?


    मारे समाज में अपराधों की फेहरिस्त लगातार लंबी हो रही है.अगर हम इस का कारण जानने की कोशिश  करेंगे तो आम तौर पर  बेरोजगारी,अशिक्षा गरीबी,पिछड़ापन इस के मुख्य कारण नज़र आते हैं.परन्तु आज के समय में इन कारणों से हटकर भी कुछ अन्य कारण है जिसने हमारे समाज कि नीव को हिला दिया है और हमारे लिए एक समस्या का रूप ले चुके है.देश में किसी भी अपराध की  अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद और फांसी निर्धारित है पर मैं जिन अपराधों के बारे में बात कर रही हूँ वो बच्चों से जुडे है और इन अपराधों की जगह स्कूल बन गए हैं....आज हम  स्कूल के छात्रों द्वारा अपने ही सहपाठी का क़त्ल करना,अपने शिक्षकों के साथ अभद्रता,अपने शिक्षक का क़त्ल,छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से दुश्मनों जैसा बर्ताव करना आदि स्थितियां देख रहे है.आज सबसे ज्यादा स्कूलों में अपराध का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ रहा है.जिस स्थान को हम विद्या का मंदिर कहते है.वहाँ पर ज्ञान प्राप्ति के साथ आज हमारी नयी पीढ़ी आपराधिक गुण भी सीख रही है. क्या यह सही है?

 
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