रंजीत कपूर से चिंटूजी के बहाने संगम पांडेय की बातचीत


‘चिंटू जी एक ऑफबीट फिल्म है’

रंजीत कपूर मुंबई फिल्म जगत के सुपरिचित पटकथा लेखक हैं। निर्देशक के रूप में उनकी पहली चिंटू जी का दूसरे हरियाणा अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के माध्यम से हरियाणा में प्रीमियर किया गया है। लेकिन इन दोनों पहचानों से अलग रंजीत कपूर एक बहुत बड़े रंग निर्देशक भी हैं। चिंटू जी के बहाने संगम पांडेय ने उनसे यह बातचीत की।

- आपने इतनी सारी फिल्में लिखीं है लेकिन बतौर निर्देशक चिंटूजी आपकी पहली फिल्म है, इससे जुड़े अनुभव कैसे रहे ?

- 1982 से मैं फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा रहा हूं, लेकिन मैंने पहली फिल्म अब 60 वर्ष की उम्र में बनाई है। कई बड़े आफर मुझे मिले थे, पर प्रोड्यूसर्स का दखल बहुत था। वो फिल्म अपनी शर्तों पर चाहते थे और मैं अपनी शर्तों पर। मैं मुख्यतर: रंगमंच से हूं। सिनेमा को लेकर मुझे कोई क्रेज नहीं था। बहुत इंतजार करने के बाद यह संयोग बना कि जैसी फिल्म मैं बनाना चाहता था प्रोड्यूसर उसके लिए राजी थे। चिंटूजी आपको आफबीट फिल्म लगेगी। रुटीन सिनेमा से यह अलग है।

- क्या आप खुद इस फिल्म से संतुष्ट हैं?

- जिस दिन मैं संतुष्ट हो गया तो समझ लीजिए मैं मर गया। एक हद तक मैं जो अपनी बात कहना चाहता था इसमें कह सका। मुझे इसमें थोड़ी सफलता मिली है। थोड़ी इसलिए कह रहा हूं कि हिन्दुस्तान में ऑफबीट सिनेमा बनाना व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक नहीं होता। इसे रिलीज करने वाली कंपनी ने फिल्म को प्रमोट ही नहीं किया। लोगों को पता ही नहीं लगा कि यह फिल्म कब आई, कब चली गई। जबकि समीक्षाओं में इसे बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं। प्रेस शो के दौरान फिल्म समीक्षक इसे देखने के बाद देर तक ताली बजाते रहे। यह एक बहुत बड़ी बात है। हर क्रिटिक ने तीन स्टार दिए हैं, चार स्टार दिये हैं, लेकिन कहीं पोस्टर नहीं है, होर्डिंग्स नहीं है। तो इस तरह की चीजों ने मुझे बहुत निराश किया। मुंबई में डायरेक्टर खुद ही प्रोड्यूसर हो या खुद ही रिलीज कर सके तभी मन की फिल्म बनाना संभव है, जो कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए असंभव सी चीज है। पाइपलाइन में हैं तो बहुत सारे प्रोजेक्ट, लेकिन फिल्म अपनी शर्तों पर ही बनाऊंगा, बना सका तो ठीक है, नहीं तो कोई बात नहीं। थिएटर मेरे पास है और मेरी रचनात्मक जरूरतों को पूरा करता है।

- ‘एक रुका हुआ फैसला’ काफी कुछ आपकी ही फिल्म है। रंगमंच के लिए आपने ही वो आलेख तैयार किया। थिएटर के डिजाइन और कलाकारों के साथ ही वो फिल्म बनाई गई। उस अनुभव के बारे में कुछ बताइये?

- जब मेरे निर्देशन में एक रुका हुआ फैसला का पहला शो मुंबई में 1983 में हुआ था तो मुझे यश चोपड़ा जी का आफर था कि उन्हीं कलाकारों को लेकर आप अपने निर्देशन में फिल्म बनाइये। यश जी ने वो प्ले देखा था। फिल्म इंडस्ट्री में वो नाटक बहुत लोगों ने देखा था। ‘एक रुका हुआ फैसला’ पर फिल्म बनाने के मेरे पास तीन आफर थे। एक अन्य नाम मैं भूल रहा हूं और एक थे बासु चटर्जी। बासु चटर्जी ने कहा कि निर्देशन में नाम तो उनका ही जाएगा। तो मैंने कहा कि मैं क्यों करूं, मैं यशजी के लिये करूंगा। मगर हालात ऐसे हुए कि मुझे अचानक पैसों की जरूरत पड़ी और यश जी उन दिनों थोड़े परेशान चल रहे थे और अपनी फिल्म मशाल में लगे हुये थे। उन्होंने कहा कि मशाल बन जाने दीजिये उसके बाद बनायेंगे। लेकिन मैं उतना इंतजार नहीं कर सकता था, कुछ ऐसी दिक्कतें थीं। तो मैंने बासु दा से कहा कि आप मुझे पैसे दीजिये मैं आपको राइट्स देता हूं। तब फिर बासु दा ने बनाई। लेकिन बासु दा को कुछ चीजें मैं कहना चाहता था लेकिन वो नहीं कर पाये क्योंकि उस जमाने में फिल्म बनाना बहुत रिस्की था।
बासु दा ने मुझे एक बहुत अच्छा जुमला कहा था कि देखो मैं कैलकुलेटेड रिस्क ले रहा हूं। मैं इतने में बनाना चाहता हूं और इतने में मेरी रिकवरी हो जायेगी। उससे ज्यादा नहीं कर सकता। जबकि मैंने उनसे कहा था कि इसमें सैट भी जो हैं वो एक बहुत जरूरी कैरेक्टर हैं, जो हमारी न्याय व्यवस्था है वो जर्जर हो चुकी है...मैं उसमें लकड़ी का इस तरह का सैट जिसमें खराब सीढियां इधर-उधर पान की पीक थूकी हुई है, चाहता था। लेकिन बासु दा ने कहा कि नहीं यार, चलता है सब, चलने दो। वो बन गई यह एक बड़ी बात थी। उन्होंने मेरी शर्त मानी... उन्होंने बांबे की कास्ट लेना चाही, पर मैंने कहा कि मैं तभी राइट दूंगा जब मेरे नाटक के एक्टर इसमें काम करेंगे और सबको बराबर का पैसा दिया जायेगा। पंजाबी के प्रसिद्ध नाटककार डॉ. चरणदास सिद्धू उसमें छोटा सा रोल करते थे। बासु दा ने मुझसे कहा कि वो एक एंट्री है हाफ शिट का काम है, यहां 500 रुपये में हो जाएगा। मैंने कहा आपको नहीं पता कि वो चपरासी का रोल करते हैं लेकिन मैं उनकी इज्जत करता हूं कि वो पीएचडी हैं और प्रोफेसर हैं उनको भी उतने ही पैसे मिलेंगे। लेकिन बासु दा मुझे बहुत प्यार भी करते थे। आज भी वो कहते हैं कि यह व्यक्ति जो है बहुत भावुक है अपनी कास्ट को ले के अपने लोगों को लेकर।

- एक निर्देशक के तौर पर थिएटर और सिनेमा में काम करने के क्या फर्क हैं ?
- थिएटर में जो एक बहुत बात होती है थिएटर जो है इसमें आपको तुरंत दर्शकों का रिएक्शन मिलता है। सिनेमा एक खर्चीला माध्यम है। थिएटर में मुझे बहुत आजादी है अपनी बात कहने की। एस्ट्रैक्ट सिनेमा इज टू रियल। अगर पेड़ है तो पेड़ ही है वो रियल है। थिएटर में आप जंगल दूसरी तरह से क्रिएट कर सकते हैं।

-एक निर्देशक के रूप में आपकी प्राथमिकता क्या होती है?

- मैं अपनी कोई इमेज नहीं बनाना चाहता। मैं प्रेडिक्टेबल नहीं होना चाहता हूं। आज ये प्ले किया है कल ऐसा प्ले करूंगा जो लोगों ने सोचा नहीं होगा। मुझे इसमें आनंद आता है, क्योंकि अगर मैं लगातार ही कॉमेडी करता चला जा रहा हूं तो इसमें मजा नहीं है। मुझे भी रस आना चाहिये। जब मेरे अभिनेताओं को आनंद नहीं आयेगा, मुझे आनंद नहीं आयेगा तो दर्शकों को कैसे आयेगा। मेरे जो विषय हैं वो एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं।
मुझे एब्सट्रैक्ट या अमूर्तन भी बहुत पसंद है, लेकिन मैं सिर्फ प्रयोग करने के लिए प्रयोग नहीं करता हूं। मैं प्रयोग के लिए दर्शकों को सैक्रीफाइज नहीं कर सकता। मैं अपने लिए नाटक नहीं कर रहा हूं मैं दर्शक के लिए कर रहा हूं। अपने लिए मैंने किया था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ाई के दौरान मेरी डिप्लोमा प्रस्तुति बहुत ही एब्सट्रेक्ट थी। लेकिन पब्लिक ने उसको इतना पसंद किया, उन्हें इतना समझ में आया कि खुद मेरे लिए यह बहुत उत्साहवर्धक बात थी।

- यहां आकर आपको कैसा लगा?-
यमुनानगर आकर मुझे बहुत अच्छा लगा है। मैं सन् 74 में पहली बार यहां आया था, तब मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा था और नाटक ‘मिट्टी की गाड़ी’ का शो था। एक कॉलेज का फिल्म समारोह आयोजित करने बहुत बड़ी बात है। एक संस्थान अपने सीमित साधनों में इतना बड़ा काम करके दिखा रहा है। मेरे सीनियर हैं एम के रैना, वो यहां मुझे मिले और कहने लगे कि ऐसा अगर हिन्दुस्तान में सब जगह हो जाये तो बहुत अच्छा होगा।
 
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