दीवाली पर कैसे दूं शुभकामना : निकाल रही है दिवाला

देना चाहता हूं




पर मन मानता नहीं



महंगाई को जानता हूं



सिर्फ मैं ही नहीं



सब जानते हैं



पीडि़त हैं



महंगाई नहीं देती है मौका



नहीं बनी ऐसी कोई नौका



कि पार उतार दे



तार दे



तार से बांधती तो है



महंगाई के



याराना रखती है सबसे



सिर्फ कुछेक को छोड़कर



बाकियों को देती है रौंद







बचते हैं नेता



व्‍यापारी, मुनाफाखोर



भ्रष्‍टाचारी और खिलाड़ी



खिलाड़ी वे जो खेलते नहीं हैं



खिलाड़ी वे जो आयोजन करवाते हैं



साधन सभी मुहैया करवाते हैं



धन संजो लेते हैं







दिवाली पर कैसे दूं शुभकामना



जब अब निकल रहा है अर्थ



शुभ का मना



यही सार्थक है



शेष निरर्थक है







फिर भी विवश हूं



करता हूं मंगल कामना



क्‍या मालूम कभी



फलीभूत हो जाए



महंगाई जो वर्तमान है



भूत हो जाए



साधारण जन



आम जन



इससे अभिभूत हो जाए।

1 comments:

चन्द्र कुमार सोनी ने कहा…

kuch bhi kahiye.
filhaal to main yahi kahungaa =
"happy diwaali."
thanks.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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खिल गई देखो
बगीची की हर कली।

 
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